उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में चल रहे आध्यात्मिक प्रवचन में सोमवार को साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा 6 ने जीवन में पूर्णता के वास्तविक अर्थ को समझाते हुए कहा कि मनुष्य हमेशा कुछ पाने और पूर्ण बनने की इच्छा रखता है, लेकिन वास्तविक पूर्णता बाहरी वैभव, सत्ता और साधनों से नहीं बल्कि आत्मिक शुद्धि और कर्मों से मुक्ति प्राप्त करने से मिलती है।
साध्वी श्रीजी ने कहा कि जब व्यक्ति को जीवन में अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप चीजें नहीं मिलती हैं तो वह स्वयं को अधूरा महसूस करने लगता है। यह अधूरापन शारीरिक और मानसिक स्तर पर हो सकता है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्णता का एकमात्र आधार कर्मों का क्षय है। जो व्यक्ति कर्म बंधनों से मुक्त हो जाता है, वही वास्तविक रूप से पूर्ण कहलाता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में आने वाली परिस्थितियों के प्रति व्यक्ति का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण होता है। प्रतिकार, स्वीकार और सत्कार जीवन की तीन अवस्थाएं हैं। क्रोध में व्यक्ति प्रतिकार करता है, मजबूरी में स्वीकार करता है, जबकि जागरूकता और समझ के साथ किया गया व्यवहार सत्कार कहलाता है। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी समभाव बनाए रखना ही आध्यात्मिक साधना है।
साध्वी श्रीजी ने सनत कुमार चक्रवर्ती के प्रसंग के माध्यम से बताया कि जब उन्हें अपने स्वास्थय में बदलाव महसूस हुआ तो उन्होंने तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दी, बल्कि चिंतन किया। धन्वंतरि द्वारा उपचार का प्रस्ताव देने पर उन्होंने बीमारी के मूल कारण को समझने का प्रयास किया। उन्होंने बताया कि केवल बीमारी को दबाना समाधान नहीं है, बल्कि उसके कारण को समाप्त करना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि इसी प्रकार क्रोध को भी केवल शांत करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके मूल कारण को समाप्त करने का प्रयास करना चाहिए। शास्त्रों में क्रोध के क्षय और आत्मसंयम का मार्ग बताया गया है।
ट्रस्ट अध्यक्ष राज लोढ़ा ने बताया कि प्रवचन के पूर्व साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमनरुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने आध्यात्मिक प्रवचन का लाभ लिया।
कर्मों से मुक्ति ही सच्ची पूर्णता का मार्ग: साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी ने समझाया आत्मचिंतन का महत्व
