उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में शुक्रवार को आयोजित नियमित व्याख्यान में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने श्रावक-श्राविकाओं को जीवन में समरसता, आज्ञापालन और आत्मपरिवर्तन का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जीवन ऐसा होना चाहिए, जिसमें गृहस्थ रहते हुए भी समाधि और आनंद की अनुभूति हो। सहयोगी का व्यवहार व्यक्ति के भावों को प्रभावित करता है, इसलिए जीवन में परस्पर सहयोग और औचित्यपूर्ण व्यवहार जरूरी है।
उन्होंने कहा कि आज्ञा और जिज्ञासा में अंतर समझना चाहिए। परमात्मा महावीर को गोशाला और गौतम स्वामी जैसे सहयोगी मिले। गौतम स्वामी ने कभी आज्ञा पर प्रश्न नहीं किया और इसी समर्पण से उन्होंने आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त की। संसार के व्यापार में नुकसान से बचते हैं, लेकिन अध्यात्म के क्षेत्र में अपने आचरण को नहीं देखते। उन्होंने कहा कि दूसरों को बदलने के बजाय पहले स्वयं में परिवर्तन लाना चाहिए। इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, नमन रुचि श्रीजी, योगरुचि श्रीजी एवं तन्मय रुचि श्रीजी ने गीत प्रस्तुत किया।
आनंदमय जीवन के लिए पहले स्वयं में करें परिवर्तनःसाध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी
