उदयपुर 16 अगस्त /राजस्थान विद्यापीठ के संस्थापक मनीषी पंडित जनार्दनराय नागर की 29वीं पुण्यतिथि पर रविवार को विद्यापीठ के सभी संघटक महाविद्यालयों में पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें नमन किया। मुख्य समारोह प्रतापनगर परिसर में लगी जनुभाई की आदमकद प्रतिमा पर कुलाधिपति भंवरलाल गुर्जर, कुलपति प्रो. मंजु मांडोत, प्रो. हेमेन्द्र चण्डालिया, प्रो. सरोज गर्ग, प्रो. पारस जैन, प्रो. हेमेन्द्र चौधरी, अध्यक्ष डॉ. प्रकाश धाकड सहित कार्यकर्ताओं ने पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें नमन किया। इसके साथ ही माणिक्यलाल वर्मा श्रमजीवी महाविद्यालय एवं फतहसागर पाल पर बनी दर्शक दीर्घा में लगी जनुभाई की मूर्ति कार्यकर्ताओं ने पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हे नमन किया।
जनुभाई के जीवन मूल्यों को जीवन आत्मसात करने की जरूरत – बीएल गुर्जर
कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए कुलाधिपति बी.एल. गुर्जर ने जनुभाई और विद्यापीठ के संघर्षों को साझा करते हुए कार्यकर्ताओं से संस्था की विचारधारा को अक्षुण्ण रखने और जनुभाई के जीवन मूल्यों को जीवन में आत्मसात करने की जरूरत पर जोर दिया। जनुभाई साधारण परिवार से थे, महाराणा ने उन्हें बनारस शिक्षण दीक्षण के लिए भेजा। उस समय देश में आजादी का आंदोलन चल रहा था और वे वहॉ आंदोलनकारियों के सम्पर्क में आये और आजादी के आंदोलन में कुद पड़े। आजादी के 10 वर्ष पूर्व 1937 में विपरीत परिस्थितियों में संस्थान की स्थापना हुई जिसका इतिहास कार्यकर्ताओं को पढ़ना चाहिए। तीन रूपयों से शुरू संस्थान का आज 70 करोड़ का वार्षिक बजट है। उन्होंने जनु भाई की शैक्षिक विचारधारा एवं विद्यापीठ की स्थापना और संघर्षों को रेखांकित करते हुए कहा कि हर समाज हर तबके की अनिवार्य शिक्षा कि उनकी सोच को बताया। उन्होंने अनुशासन और दायित्वों के निर्वहन से विद्यापीठ की विकास यात्रा पर भी रोशनी डाली। उन्होंने कार्यकर्ताओं से जानू भाई के विचारों को अपने और शिक्षा के लिए उनकी सोच एवं सपने को पूरा करने में कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग करने का भी आह्वान कार्यकर्ताओं से किया।
जनुभाई एक साहित्यकार ही नही, वरन् एक युगदृष्टा थे – कुलपति प्रो. मंजु मांडोत
कुलपति प्रो. मंजु मांडोत ने कहा कि जनुभाई एक साहित्यकार ही नही, वरन् एक युगदृष्टा थे। समाज के अंतिम वर्ग तक शिक्षा क अलख जगाने के लिए 26 वर्ष की उम्र में राजस्थान विद्यापीठ की स्थापना की। वे जनतांत्रिक मूल्यों के समर्थक थे। साहित्य और समाज एक दूसरे के पूरक हैं , साहित्य वो परिधान है जो जनमानस के मानवीय संवेगों की सशक्त अभिव्यक्ति है जिसमें परिवर्तन की आधारशिला निहित है।साहित्य हर कालखंड की पृष्ठभूमि को अभिव्यक्त करता है साहित्य के प्रभावों और परिवर्तन का सीधा असर मानव समाज एवं सामाजिक पृष्ठभूमि पर प्रतिबिंबित होता है आनंदमय जीवन के लिए सामाजिक उन्नयन हृदय की संवेदनशीलता सर्वजन हिताय मानव केंद्रित साहित्य एवं जीवन के मार्ग लक्ष्य और वैचारिक स्वतंत्रता की आवश्यकता और महत्व दोनों को ही जानू भाई ने अपने साहित्य और शिक्षा के माध्यम से समाज के सामने रखा ।
इस अवसर पर प्रो. अवनिश नागर, प्रो. युवराज सिंह राठौड, डॉ. अमीया गोस्वामी, डॉ. भवानपीपाल सिंह राठौड, प्रो. बलिदान जैन, डॉ. दिलिप सिंह चौहान, डॉ. हीना खान, प्रो. रचना राठौड़, प्रो. अमी राठौड़, डॉ. भारत सिंह देवडा, प्रो. सुनिता मुर्डिया, डॉ. मनीष श्रीमाली, डॉ. एसबी नागर, डॉ. दिनेश श्रीमाली, प्रो. लालराम जाट, डॉ. धीरज प्रकाश, डॉ. सपना श्रीमाली, डॉ. भुरालाल श्रीमाली, किशन सिंह राव, आरीफ मोहम्मद, डॉ. आशीष नंदवाना, डॉ. धमेन्द्र राजौरा, डॉ. चन्द्रेश छतलानी, उमराव सिंह राणावत, डॉ. संजीव राजपुरोहित, डॉ. अपर्णा श्रीवास्तव, डॉ. कुल शेखर व्यास, डॉ. नजमुद्दीन, डॉ. उदयभान सिंह, डॉ. सपना श्रीमाली, डॉ. गुणबाला आमेटा सहित विभिन्न विभागों के डीन डायरेक्टर्स, वरिष्ठ संकाय सदस्य, कार्यकर्ता, विद्यार्थी ने जनुभाई की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें नमन किया।
