सभी को सुख देने की क्षमता भले आपके हाथों में ना हा लेकिन ऐसा करें कि किसी को आपके द्वारा दुख न पहुंचेःआचार्य श्री ज्ञानेश

उदयपुर। न्यू भूपालपुरा में स्थित अरिहंत भवन में विराजित अरिहंत भवन में आचार्य प्रवर ज्ञानचंद महाराज ने आज की धर्म सभा में बोलते हुए कहा कि सभी को सुख देने की क्षमता भले आपके हाथों में ना हो लेकिन ऐसा करें किसी को आपके द्वारा दुख न पहुंचे। यह तो आपके हाथ में है। सभी जीव अपने-अपने कर्म भोगते हैं लेकिन आप अपने द्वारा यह कोशिश की जानी चाहिये कि आपके व्यवहार से, वचन से, किसी क्रियाकलाप से उसे दुख ना हो। जाने-अनजाने में दुख पहुंच गया तो आप खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खंमतु में.. ये बोल कर क्षमायाचना कर लिजिये। यह पाठ हमारी नहीं भगवान ने दिया है यह भाषा सभी जीव समझते हैं।
उन्होंने भगवान ने दसवें कालिक सूत्र में एक बात कही ह कि जब बगीचे के पेड़ देखा तो यह मत बोलो, यह लकड़ी अच्छी है, फर्नीचर अच्छा बनेगा। ऐसा बोलने से उनको दुख होगा। भगवान ने यह भी बताया कि कोई अंधा या बहरा है तो उसे अंधा, गूंगा, बहरा मत कहो। यह भी उसको दुःख उपजाने वाली भाषा है। जिसे दिखता नहीं उसकी अन्य इंद्रिय जागृत हो जाती है। एकेंद्रीय जीव के भले एक इंद्रिय है, उसके एक इंद्रिय से अन्य इंद्रिय का भी काम हो सकता है।
आटा एक है, उससे तरह-तरह के पकवान बन सकते हैं, वैसे ही एक इंद्रिय से सभी इंद्रियों के काम किया जा सकते हैं। एक लड़की हमने देखी, वह आंख पर पट्टी बांधने के बाद पेपर पर हाथ लगाकर या पेपर पर खड़े होकर हाथ या पैरों के स्पर्श मात्र से पेपर पढ़ लेती थी। कंप्यूटर में जो सेटिंग करी हुई वो उस उस भाषा में वह एक प्रवचन या मैटर कन्वर्ट हो जाता है। वैसे ही इंद्रियां हैं, एक इंद्रिय का काम दूसरी इंद्री करने की क्षमता रखती है। यही बात आपको णमोत्थुणं  के लिए समझना चाहिए।
अरिहंत भवन में सुदर्शन मुनि के 16 की तपस्या रही। मीनू छाजेड़ के पांच, मंजू भंडारी के तेला चल रहा है। कार्यक्रम में महिलाओं ने सर्व सिद्धिदायक मंत्र की साधना की।

By Udaipurviews

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