ब्रह्म मुहूर्त में जागना ही सर्वाेत्तम, व्यवस्थित दिनचर्या में धर्म को भी दें स्थान..5 बजे जागना हीरा, 6 बजे जागना सोना, 7 बजे जागना चाँदी, और उसके बाद जागना लोहा वत् के समान
उदयपुर। देवेन्द्र धाम महावीर समवशरण में आयोजित विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए डॉ. सुरेंद्र मुनि ने प्रातःकाल के समय को सर्वाेत्तम बताते हुए कहा कि यह ब्रह्म मुहूर्त प्रत्येक दृष्टि से मांगलिक माना जाता है। उपस्थित जन समूह को मुनि श्री जी ने शरीर में स्थित सात चक्र पर सात मुद्राओं के द्वारा सात मंत्र की साधना संपन्न करवाई और आग्रह किया कि यह साधना प्रतिदिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त की अमृतवेला में की जाए तो अति उत्तम रहेगा, यदि इस समय हमारे विचार उत्तम होंगे, तो संपूर्ण दिन श्रेष्ठता के साथ व्यतीत होगा।
उन्होंने कहा कि सभी धर्मों में प्रातःकालीन प्रार्थना, ध्यान और योग का विशेष विधान है। सुबह की सकारात्मक ऊर्जा दिनभर सुख, शांति और सौभाग्य की सूचक बनती है। जीवन को अनुशासित और सुव्यवस्थित जीने के लिए ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास जैसे चार आश्रमों तथा सामाजिक व्यवस्थाओं का क्रम निर्धारित किया गया है, ताकि समाज में परस्पर भाईचारा और सहयोग बना रहे। धर्मसभा के दौरान भक्तामर व नवकार मंत्र की विधिवत् आराधना कर ऊर्जा जागृत की गई।
सभा को संबोधित करते हुए प्रवर्तक डॉ. राजेन्द्र मुनि ने जीवन को प्रकृति का अनमोल उपहार बताते हुए प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करने की प्रेरणा दी। उन्होंने सिकंदर का उदाहरण देते हुए कहा कि अंतिम समय में संपूर्ण वैभव लुटाने के बाद भी वह जीवन के कुछ पल नहीं खरीद सका और संसार की सारी दौलत छोड़कर खाली हाथ चला गया। इसलिए बीता हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता, समय का मूल्य समझें।
मुनि श्री ने ब्रह्म मुहूर्त के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि 5 बजे जागना श्हीरा वत्श्, 6 बजे जागना श्सोना वत्श्, 7 बजे जागना श्चाँदी वत्श् और उसके बाद जागना श्लोहा वत्श् के समान है। उन्होंने सभी को स्वावलंबी बनने, माता-पिता, बुजुर्गों व गुरुजनों को नित्य प्रणाम करने तथा व्यवस्थित दिनचर्या में धर्म को प्रमुख स्थान देने का संदेश दिया।
कार्यक्रम के समापन पर उपाध्याय रमेश मुनि और दीपेश मुनि द्वारा मंगल भावना व्यक्त की गयी तथा समाज की ओर से अध्यक्ष एडवोकेट रोशनलाल जैन द्वारा आवश्यक सूचनाएं प्रसारित की गईं।
क्षणिक सुखों की आसक्ति दुखों का कारण, संयम और संस्कारों से मिलता है आत्मकल्याण का मार्गःसाध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी
उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में मंगलवार को आयोजित नियमित धर्मसभा में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने भगवान आदिनाथ और भरत चक्रवर्ती के प्रसंग के माध्यम से श्रद्धालुओं को वैराग्य, संयम और आत्मकल्याण का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि परिग्रह के प्रति अत्यधिक आसक्ति व्यक्ति को दुखों की ओर ले जाती है। संसार के भोग क्षणिक सुख प्रदान करते हैं, जबकि संयम और आत्मचिंतन जीवन को सही दिशा देते हैं।
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