महाराणा प्रताप जयंती की पूर्व संध्या पर 450 आहुतियों का हवन, स्वाभिमान और शौर्य का संदेश जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प
17 को होगा पॉकेट बुक का विमोचन
उदयपुर, 16 जून। प्रातःस्मरणीय वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की जयंती की पूर्व संध्या एवं हल्दीघाटी युद्ध के 450 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आलोक संस्थान एवं अखिल भारतीय नववर्ष समारोह समिति के संयुक्त तत्वावधान में मंगलवार को आलोक संस्थान स्थित सरस्वती मंदिर परिसर में महाराणा प्रताप की प्रतिमा के समक्ष विशेष हवन-यज्ञ का आयोजन किया गया। इस अवसर पर महाराणा प्रताप के शौर्य, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति को स्मरण करते हुए 450 आहुतियाँ अर्पित की गईं।
कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि महाराणा प्रताप के संघर्ष और वनवास काल से जुड़े क्षेत्रों के प्रतिनिधि भी इसमें शामिल हुए। प्रताप के निवास और गतिविधियों से जुड़े कोल्यारी एवं आवरगढ़ (झाड़ोल क्षेत्र) से भील समाज के प्रतिनिधियों ने सहभागिता की, वहीं गोगुंदा क्षेत्र से झाला समाज के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे। उनकी उपस्थिति ने आयोजन को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष गरिमा प्रदान की।
इस अवसर पर संबोधित करते हुए डॉ. प्रदीप कुमावत निदेशक, आलोक संस्थान ने कहा कि पिछले 17 वर्षों से आलोक संस्थान निरंतर यह प्रयास कर रहा है कि महाराणा प्रताप के जीवन और हल्दीघाटी युद्ध के वास्तविक इतिहास को समाज के समक्ष प्रमाणों सहित प्रस्तुत किया जाए।
उन्होंने कहा कि हल्दीघाटी का युद्ध केवल तीन घंटे की भिड़ंत तक सीमित नहीं था बल्कि उसका प्रभाव कई महीनों तक रहा। विभिन्न शिलालेखों, ऐतिहासिक स्रोतों और नवीन शोधों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि सितंबर 1576 तक प्रताप की रणनीति के कारण मुगल सेना मेवाड़ में टिक नहीं सकी और अंततः उसे क्षेत्र छोड़ना पड़ा। प्रताप द्वारा अपनाई गई घेराबंदी और आपूर्ति मार्गों को बाधित करने की नीति ने मुगल सेना को अत्यंत कठिन परिस्थितियों में पहुँचा दिया। इसलिए हल्दीघाटी संघर्ष का अंतिम परिणाम महाराणा प्रताप विजेता रहे ये विजय स्वाभिमान की विजय के रूप में देखा जाना चाहिए।
डॉ. कुमावत ने कहा कि दुर्भाग्यवश कुछ इतिहासकारों ने इस दृष्टिकोण को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जिसके कारण स्वतंत्रता के बाद भी समाज के एक बड़े वर्ग तक अपूर्ण और भ्रमित करने वाली ऐतिहासिक जानकारी पहुँचती रही। अब समय आ गया है कि नवीन शोध, प्रमाणिक दस्तावेजों और स्थानीय ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर इतिहास को पुनः समाज के सामने रखा जाए। उन्होंने कहा कि आलोक संस्थान इस दिशा में निरंतर शोध, संगोष्ठियों और जनजागरण कार्यक्रमों के माध्यम से कार्य कर रहा है।
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित सभी लोगों ने महाराणा प्रताप के जयकारों के साथ राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा का संकल्प लिया। हवन के पश्चात सभी ने मशाल प्रज्वलित कर स्वाभिमान यात्रा का प्रतीकात्मक संदेश दिया तथा महाराणा प्रताप की आरती उतारी। इस अवसर पर रणकंकण की धुन भी बजाई गई, जिसने उपस्थित जनसमूह में वीरता और उत्साह का वातावरण निर्मित कर दिया।
कार्यक्रम में विशेष रूप से तैयार किया गया “हल्दीघाटी युद्ध दिवस” विषयक गीत भी प्रस्तुत किया गया, जिसे उपस्थित जनों ने अत्यंत भावविभोर होकर सुना।
कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों, सामाजिक प्रतिनिधियों, शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं नागरिकों ने महाराणा प्रताप के आदर्शों को जीवन में अपनाने तथा राष्ट्र गौरव की भावना को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का संकल्प लिया। आयोजन का समापन महाराणा प्रताप के जयघोष एवं राष्ट्रगान के साथ हुआ।
कल ( 17 जून ) होगा पॉकेट बुक का विमोचन
महाराणा प्रताप के जीवन और संघर्ष को सरल एवं प्रमाणिक रूप में जनसामान्य तक पहुँचाने के उद्देश्य से महाराणा प्रताप पर आधारित एक विशेष पॉकेट बुक भी तैयार की गई है। इस पुस्तक का लेखन एवं संपादन महाराणा प्रताप विषय पर लंबे समय से कार्य कर रहे शोधकर्ता, लेखक एवं फिल्म “महाराणा प्रताप” के निर्माता डॉ. प्रदीप कुमावत द्वारा किया गया है।
इस पॉकेट बुक का विमोचन महाराणा प्रताप जयंती समारोह के दौरान नगर निगम प्रांगण में आयोजित मुख्य कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथियों द्वारा किया जाएगा।
