चित्रकूट में श्री भरत की श्रीराम प्रेममयी दशा को देखकर वहां के पत्थर भी पिघलने लगे

प्रभु श्री राम कथा का सातवां दिन
राम-भरत मिलाप में भक्तों की आंखों में अश्रुधारा फूट पड़ी
उदयपुर। धार्मिक सत्संग समिति के तत्वावधान में अंबापोल स्थित पुष्प वाटिका में चल रही भव्य श्री राम कथा के सातवें दिन आज प्रभु श्री राम और भरत मिलाप के प्रसंग को सुनने के लिए श्रोताओं की खासी भीड़ रही। जब इस प्रंसग को भक्तों ने देखा तो उनकी आंखों से अश्रुधारा फूट पड़ी।
व्यास पीठ पर कथा वाचक साध्वी विश्वेश्वरी देवी ने राम-भरत मिलाप का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि महाराज भरत ने चित्रकूट यात्रा के लिए सम्पूर्ण अयोध्यावासियों को तैयार कर लिया। राजतिलक की सामग्री को साथ लेकर गुरुदेव की अनुमति से भरत सभी को साथ लेकर भगवान की खोज में चल पड़ें। साध्वी ने कहा कि इस प्रसंग से यह सीख मिलती है कि जन्म जन्मांतर से भटके हुए जीव को तब तक परम शान्ति नहीं मिल सकती जब तक कि वह भगवान की खोज न करें। मार्ग की अनेक बाधाओं को पार करते हुए श्री भरत चित्रकूट तक पहुंचे। सच्चे साधक के मार्ग में अनेक बाधाएं आती है किन्तु राम प्रेम के बल पर वह सम्पूर्ण बाधाओं को पार कर लेता है।
भाई-भाई के प्रेम को दर्शन कराने के लिए ही श्रीराम और भरत जी के मिलन का प्रसंग आया। चित्रकूट में श्री भरत की श्रीराम प्रेममयी दशा को देखकर वहां के पत्थर भी पिघलने लगे। भगवान ने भरत के आग्रह को स्वीकार करते हुए चित्रकूट की सभा में उन्हीं को निर्णय करने के लिए कहा तो भरत ने भगवान को वापस अयोध्या लौटने के लिए प्रार्थना की तथा स्वयं मित्रता के वचन को मानकर वनवासी जीवन बिताने का संकल्प लिया किन्तु भगवान को यह स्वीकार नहीं था। दोनों भाई एक दूसरे के लिए सम्पत्ति और सुखों का त्याग करने के लिए आतुर थे और विपत्ति को अपनाना चाहते थे। आज तो भाई भाई की सम्पत्ति को हड़पना चाहता है। यदि भाई भाई की विपत्ति को बंाटने लगे तो संसार भर के परिवारों की समस्याओं का समाधान हो सकता है। भाई-भाई का प्रेम आज न जाने कहां चला गया। श्रीराम-भरत के प्रेम से प्रत्येक भाई को भाई से प्रेम का संदेश लेना चाहिए।
भरत ने भगवान की चरण पादुकाओं को सिंहासनारूख किया और चौदह वर्ष तक उनकी सेवा की। यह भ्रातृत्व प्रेम की पराकाष्ठा है। श्री भरत ने भाई का भाग कभी स्वीकार नहीं किया बल्कि अपना भाग भी भगवान को देकर सदैव दास बनकर उनकी सेवा करते रहे। भगवान श्रीराम चरण में रहकर वनवासी-तपस्वी जीवन व्यतीत करते है किन्तु भरत तो नंदीग्राम में रहकर भी सम्पूर्ण नियमों का पालन करते हुए भी सम्पूर्ण अयोध्यावासियों का ध्यान भी रखते हैं। साध्वी जी ने कहा कि इस प्रकार से भरत का चरित्र रामजी से बड़ा प्रतीत होता है। भरत जी के नाम का अर्थ है भ अर्थात्त भक्ति र अर्थात् रति त अर्थात् त्याग । अर्थात् भगवान की भक्ति, रति और त्याग का अदभुत उदाहरण हैं ष्श्री भरतष् ।
समिति के अध्यक्ष अनिल शर्मा एवं कमलेश पारीक ने बताया कि श्री राम कथा में भरत मिलाप का प्रसंग अद्भुत और अनुपम होता है। भाई से भाई का प्रेम, त्याग तपस्या और जीवन के यथार्थ किससे सीख मिलती है। भरत मिलाप का यह प्रसंग संपूर्ण रामचरितमानस में सबसे लोकप्रिय माना जाता है। इसी प्रसंग को सुनने के लिए पुष्प वाटिका में श्रद्धा इस तरह अमरीकी पंडाल छोटा पड़ गया।

By Udaipurviews

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