सुबह की पहली किरण के साथ जब कोई हल्की हवा चेहरे को छूती है तो मन अनायास खिल उठता है। तपती दोपहर में अचानक आया ठंडा झोंका राहत बन जाता है और शाम की मंद बयार दिनभर की थकान हर लेती है। हम अक्सर इस सुखद अनुभूति को महसूस तो करते हैं, लेकिन शायद ही कभी सोचते हैं कि हवा हमारे जीवन में कितनी गहराई से बसी हुई है। सच तो यह है कि मनुष्य का पूरा अस्तित्व हवा की डोर से बंधा है। हवा मिले तो वाह, न मिले तो आह।
हवा केवल गैसों का मिश्रण नहीं है। यह प्रकृति का सबसे उदार उपहार है। इसमें प्राण हैं, चेतना है, अग्नि की ऊर्जा है और जल की नमी का स्पर्श भी है। जन्म लेते ही मनुष्य का पहला परिचय हवा से होता है। नवजात शिशु के रोने की आवाज दरअसल उसके फेफड़ों में प्रवेश करती पहली सांस का उत्सव होती है। जीवन की यात्रा का आरंभ भी हवा से होता है और अंत भी उसी पर आकर ठहरता है।
भारतीय संस्कृति में वायु को देवता का स्थान दिया गया है। प्राणवायु को जीवन का आधार माना गया है। योग और ध्यान की पूरी परंपरा सांसों के नियंत्रण पर आधारित है। ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले समझ लिया था कि सांस केवल शरीर को नहीं, मन और आत्मा को भी संचालित करती है। इसलिए हवा हमारे लिए केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आध्यात्मिक आधार भी है।
प्रेम और संवेदनाओं की दुनिया में भी हवा का अपना अलग स्थान है। किसी की बिखरती जुल्फों को सहलाती हवा, किसी के दुपट्टे को उड़ाती हवा, किसी के स्पर्श का संदेश लेकर आती हवा—ये सब केवल साहित्यिक कल्पनाएं नहीं, जीवन की सजीव अनुभूतियां हैं। प्रेम में हवा अक्सर शब्दों से ज्यादा प्रभावशाली दूत बन जाती है। वह बिना बोले मन की बात कह जाती है। कभी किसी की याद बनकर आती है तो कभी किसी के इंतजार की बेचैनी बढ़ा देती है।
लेकिन समय बदल गया है। आधुनिकता की अंधी दौड़ ने हवा के साथ हमारा रिश्ता भी बदल दिया है। कभी जो हवा गांव की गलियों, खेतों और पेड़ों की शाखाओं के बीच मुक्त भाव से बहती थी, आज वही हवा धुएं, धूल और जहरीले कणों से बोझिल हो गई है। विकास के नाम पर हमने पेड़ों को काटा, जंगलों को उजाड़ा और कंक्रीट के ऐसे जंगल खड़े कर दिए जहां हवा का स्वाभाविक प्रवाह भी बाधित हो गया।
आज सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस प्राणवायु को प्रकृति ने बिना मूल्य के दिया था, वही हवा अस्पतालों में ऑक्सीजन सिलेंडरों के रूप में खरीदी और बेची जा रही है। कुछ वर्ष पहले महामारी के दौरान पूरा देश उस भयावह दृश्य का साक्षी बना था जब लोग एक-एक सांस के लिए संघर्ष कर रहे थे। अस्पतालों के बाहर लंबी कतारें थीं और भीतर ऑक्सीजन की कमी से जूझते मरीज। उस समय दुनिया ने समझा कि सांस का मूल्य क्या होता है।
गर्मी के इस दौर में हवा का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। जब सूरज आग उगल रहा हो, धरती तवे की तरह तप रही हो और लू के थपेड़े शरीर को झुलसा रहे हों, तब एक ठंडी हवा का झोंका किसी वरदान से कम नहीं लगता। लेकिन आज वह झोंका भी दुर्लभ होता जा रहा है। शहरों में गर्मी केवल मौसम की नहीं, बल्कि हमारी विकास नीतियों की भी देन है। हमने छांव देने वाले वृक्षों को काटकर सीमेंट और लोहे के ढांचे खड़े कर दिए हैं। परिणामस्वरूप धरती का तापमान बढ़ रहा है और हवा की शीतलता घट रही है।
जीवन का सबसे मार्मिक क्षण वह होता है जब कोई व्यक्ति अंतिम सांसों के लिए संघर्ष कर रहा होता है। उस समय उसे न धन याद आता है, न प्रतिष्ठा और न ही कोई उपलब्धि। उस क्षण उसकी सबसे बड़ी आवश्यकता केवल एक सांस होती है। जीवनभर जिसने अनगिनत इच्छाएं पालीं, वह अंत में केवल इतना चाहता है कि कुछ क्षण और सांस ले सके। शायद इसलिए दुनिया की सबसे अनमोल संपत्ति हवा है, जिसका मूल्य तब समझ आता है जब वह कम पड़ने लगती है।
आज जरूरत केवल पर्यावरण संरक्षण के नारों की नहीं, बल्कि जीवन के प्रति जिम्मेदारी निभाने की है। हर पेड़ जो लगाया जाएगा, वह आने वाली पीढ़ियों की सांसों की सुरक्षा करेगा। हर पेड़ जो काटा जाएगा, वह किसी अनजान भविष्य की सांसें कम कर देगा। यह केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न है।
हवा का अहसास केवल चेहरे पर पड़ने वाले झोंके का अहसास नहीं है। यह जीवन की धड़कन है, प्रेम की भाषा है, प्रकृति का आशीर्वाद है और मनुष्य के अस्तित्व का आधार है। इसलिए जब अगली बार कोई ठंडी बयार आपके चेहरे को छूकर गुजरे, तो उसे केवल मौसम का हिस्सा मत समझिए। वह जीवन का स्पर्श है, जो हर पल हमें याद दिलाता है कि—
हवा मिले तो वाह,
न मिले तो आह।
और शायद पूरी मानव सभ्यता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह “वाह” हमेशा बनी रहे, “आह” में न बदल जाए।
लेखक परिचय:
भगवान प्रसाद गौड़ वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं सामाजिक चिंतक हैं। राजस्थान के उदयपुर से सक्रिय है।समसामयिक विषयों, सामाजिक सरोकारों, शिक्षा, पर्यावरण, ग्रामीण विकास, दिव्यांगजन सशक्तिकरण तथा मानवीय मूल्यों पर नियमित लेखन करते हैं। उनके लेख देश के विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं एवं डिजिटल मंचों पर प्रकाशित होते रहते हैं। सरल, संवेदनशील और विचारोत्तेजक लेखन शैली के माध्यम से वे समाज में सकारात्मक बदलाव और जनजागरण का संदेश देते हैं
लेखक – भगवान प्रसाद गौड़, उदयपुर
