नवपद ओली के चौथे दिन हुए विविध आयोजन
– आयड़ जैन तीर्थ में अनवरत बह रही धर्म ज्ञान की गंगा
– साध्वियों के सानिध्य में अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की
उदयपुर 23 अक्टूबर। श्री जैन श्वेताम्बर महासभा के तत्वावधान में तपाग’छ की उद्गम स्थली आयड़ तीर्थ पर बरखेड़ा तीर्थ द्वारिका शासन दीपिका महत्ता गुरू माता सुमंगलाश्री की शिष्या साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री एवं वैराग्य पूर्णाश्री आदि साध्वियों के सानिध्य में सोमवार को नवनद ओली के तहत विशेष पूजा-अर्चना के साथ अनुष्ठान हुए। महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर ने बताया कि आयड़ तीर्थ के आत्म वल्लभ सभागार में सुबह 7 बजे दोनों साध्वियों के सानिध्य में आरती, मंगल दीपक, सुबह सर्व औषधी से महाअभिषेक एवं अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की गई। जैन श्वेताम्बर महासभा के अध्यक्ष तेजसिंह बोल्या ने बताया कि विशेष महोत्सव के उपलक्ष्य में प्रवचनों की श्रृंखला में प्रात: 9.15 बजे साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री व वैराग्यपूर्णा ने श्री नवपद की आराधना के चतुर्थ दिन नवपद की आराधना के विषय में बताया कि उपाध्याय पद की आराधना हमें विनय की भावना से भर देती है। विनय से ही आत्म जागृति का पथ उजागर होता है। विनय की भावना से अहंकार, घमण्ड का विसर्जन होता है। उपाध्याय पद की आराधना विनय प्राप्ति की आराधना है। विनय हमे लघुता सिरपानी है। आचार्य भगवन्त तीर्थंकर के समान है तो उपाध्याय भगवन गणधर के समान हैं। जब तीर्थकर भगवान केवलज्ञान के बाद अपनी प्रथम धर्म देशना देते है तो उसमें त्रिपदी की देशना देते है। इस त्रिपदी के ऊपर गणधर भगवान् द्वादशांगी की रचना करते हैं। इसी आदर्श अंग के जाता ध्याता उपाध्याय भगवंत होते है। उपाध्याय भगवंत का मुख्य कार्य है ज्ञान दान देना। साधु जीवन मे पाँच प्रहट तक स्वाध्याय करने का विधान है। ज्ञान दान में सदा अप्रभत्त रहते हैं। जिस प्रकार सतत जल के प्रवाह से पत्थर भी टुकड़े हो जाते हैं, उसी प्रकार उपाध्याय भगवान सतत ज्ञान दान से मुर्ख शिष्य को भी पंडित बना देते हैं। शास्त्र में कहा गया है कि जो संयमी को पढ़ाता है और पढ़ता है, उसे तीर्थकर नामकर्म का बन्ध होता है। संयमी की दिनचर्या में सबसे ‘यादा समय स्वाध्याय-पढ़ाई में ही व्यतीत होता है शिष्यों को पठन- पाठन के द्वारा आगे बढ़ाते है. उपाध्याय भगवंत गण समुदाय का ध्यान रखने वाले होते है. सूत्र और अर्थ की बाचना देने वाले होते हैं, सरलता, नम्रता के साक्षात् मूर्तिवान होते हैं, अभिमान और अहंकार के विजेता होते हैं। चातुर्मास संयोजक अशोक जैन ने बताया कि आयड़ जैन तीर्थ पर प्रतिदिन सुबह 9.15 बजे से चातुर्मासिक प्रवचनों की श्रृंखला में धर्म ज्ञान गंगा अनवरत बह रही है।
चौथा दिन : उपाध्याय भगवन ज्ञान के अपार सागर होते है – साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री
