नाम मनुष्य है, लेकिन मानवता लापता है
हत्या, विश्वासघात, दरिंदगी और स्वार्थ की बढ़ती घटनाएँ केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं हैं। ये उस समाज का आईना हैं, जहाँ मनुष्य तो बचा है, लेकिन मनुष्यता कहीं खो गई है। सुबह अख़बार खोलिए। मोबाइल पर न्यूज़ देखिए। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो, जब कोई खबर आत्मा को झकझोर न दे। कहीं पत्नी अपने पति की हत्या कर देती है। कहीं मंगेतर अपने प्रेमी के साथ मिलकर उस युवक की जान ले लेता है, जिसके साथ जीवन बिताने की कसमें खाई थीं। कहीं दूधमुंही बच्ची दरिंदगी का शिकार बनती है। कहीं बेटा पिता का हत्यारा बन जाता है।…
