उदयपुर। सुरजपोल बाहर स्थित दादाबाड़ी में चले रहे चातर्मास में प्रवचन के दौरान समता मूर्ति जयप्रभा श्रीजी म.सा. की सुशिष्या साध्वी डॉ. संयम ज्योति ने कहा कि व्यक्ति गुणवान बनना चाहता है गुणानुरागी बनना नहीं चाहता है। गुणानुरागी बने बिना कभी भी व्यक्ति गुणवान नहीं बन सकता है।
साध्वी ने कहा कि गुणानुरागी बनने के लिए व्यक्ति को दूसरों के गुण देखने चाहिए और स्वयं के दोष देखने चाहिए। दूसरों के गुण देखने से व्यक्ति के जीवन गुणों का संचार होता है वही दूसरों के दोष देखने से जीवन में दोषों का संचार होता है। छोटी सी जिन्दगी में अगर दूसरों के दोष ही देखने लग जाओगे तो स्वयं के दोष कब देखोगे। टंग बहुत मुश्किल से मिली है, इसका उपयोग संभल-संभल करना। अगर टंग स्लीप हो जायेगी तो पतन के गर्त मे ले जायेगी। याद रखना टंग से निकला शब्द हजारों की गर्दने झुकवा सकता है तो हजारो की गर्दने कटवा भी सकता है।
व्यक्ति गुणवान बनता चाहता गुणानुरागी नहींःसंयम ज्योति
