– आयड़ जैन तीर्थ में चातुर्मासिक प्रवचनों की श्रृृंखला जारी
उदयपुर 03 अगस्त। श्री जैन श्वेताम्बर महासभा के तत्वावधान में तपागच्छ की उद्गम स्थली आयड़ तीर्थ पर बरखेड़ा तीर्थ द्वारिका शासन दीपिका महत्ता गुरू माता सुमंगलाश्री की शिष्या साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री एवं वैराग्य पूर्णाश्री आदि साध्वियों के सानिध्य में गुरुवार को पच्चक्खाण यानि प्रत्याख्यान के विषय में बहुत ही सरल भाषा में विवेचन के विशेष प्रवचन हुए । महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर ने बताया कि आयड़ तीर्थ के आत्म वल्लभ सभागार में सुबह 7 बजे दोनों साध्वियों के सानिध्य में अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की गई।
चातुर्मास संयोजक अशोक जैन ने बताया कि प्रवचनों की श्रृंखला में प्रात: 9.15 बजे साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री व वैराग्यपूर्णा ने पच्चक्खाण यानि प्रत्याख्यान के विषय में बहुत ही सरल भाषा में विवेचन करते हुए बताया कि द्रव्य और भाव के भेद से पच्चवरवाण के दो भेद होते हैं। अशन आदि का त्याग द्रव्य पच्चक्रवाण है और अज्ञान आदिका त्याग भाव पच्चक्रवाण है। प्रत्याख्यान शब्द तीन शब्दों से बना है। प्रति अर्थात् प्रतिकूल, आ अर्थात् मर्यादा में रहकर, ख्यान अर्थात् कथन करना। मर्यादा में रहकर अविरति का त्याग करना। श्रावक जीवन के 36 कर्तव्य के अंतर्गत आवश्यक कर्तव्य के द्वारा मुख्यतया इस प्रत्याख्यान के द्वारा आहार संबंधी नियम किया जाता है। अनादि काल से आत्मा में आहार-संज्ञा रही हुई है। उस आहार संज्ञा के संस्कारों के कारण उत्पत्ति के पहले समय से ही आत्मा आहार ग्रहण करने की क्रिया करती है। आहार ग्रहण करना, यह आत्मा का मूलभूत स्वभाव नहीं हैं परन्तु संसारी आत्मा को आहार के बिना चलता नहीं है। आहार के संस्कार आत्मा में इतने गाढ़ हो गए हैं कि उसके बिना आत्मा को चलता ही नहीं हैं। प्रत्याख्यान आवश्यक आहार की आसक्ति को तोडऩे के लिए हैं। अनादि काल से आहार ग्रहण करने की क्रिया चालू है। परन्तु उस क्रिया के साथ अनुकूल आगर मिले तो मन में राग आय और प्रतिकूल आहार मिले तो मन में द्वेष आव पैदा हुए बिना नहीं रहता है। उन राग-द्वेष की वृतियों को तोडऩे. का काम प्रत्याख्यान करता है। आहार की आसक्तियों को तोडऩे के लिए सुबह-शाम प्रत्याख्यान, पच्चक्खाण नियम करने का विधान है। सुबह-शाम करने योग्य आहार संबंधी प्रत्याख्यान के अनेक विकल्प बताए गए हैं। सुबह के प्रत्याख्यान में छह मास से लेकर नवकारसी तक के अनेक विकल्प है। रात्रि में तो आहार का ही सर्वया निषेध होने से यहां नस्वित् विकल्प है। पच्चक्खाण के अनागत, अतिक्रांत, कोटि सहित, सागार आदि के नाम से दस भेद से बताए गये है। इनमें से साधु साध्वीजी को लागु पड़ते है और उनमें से कुछ गृहस्थ को भी पच्चक्खाणों के विविध प्रकार बताए है. जैसे नवकारसी सूर्योदय के बाद 48 मिनिट पर्यंत चार प्रकार के आहार त्याग करना उसके बाद तीन नवकार गिनकर पच्चक्खाणों पारना। इसी तरह से पोरसी साद पोरसी, एकासना सायधिक उपवास आदि-आदि – इस पच्चक्रपाण में सांकेतिक पच्चकरपाण भी होते है जैसे कि जब तक नहीं खोतुं रूपों की गांठ नहीं खोकु आदि – प्रत्याख्यान में आगार यानि छूट भी रखा जाता है। परिस्थिति वश अगर का सेवन करना पड़े तो व्रत संग का महादोष का कारण है। हमें प्रतिदिन तप की वृद्धि के लिए प्रत्याख्यान करना ही चाहिए। जैन श्वेताम्बर महासभा के अध्यक्ष तेजसिंह बोल्या ने बताया कि आयड़ जैन तीर्थ पर प्रतिदिन सुबह 9.15 बजे से चातुर्मासिक प्रवचनों की श्रृंखला में धर्म ज्ञान गंगा अनवरत बह रही है।
प्रत्याख्यान : आहार की आसक्तियों को तोडऩा : साध्वी वैराग्यपूर्णाश्री
