उदयपुर। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ पंचायती नोहरा उदयपुर के तत्वावधान में आयोजित धर्म सभा में जैन संत प्रवर्तक सुकन मुनि ने कहा कि इन दिनों अमीरी को इज्जत का माध्यम माना जाता रहा है। इज्जत पाना हर मनुष्य की स्वाभाविक इच्छा है इसलिए प्रचलित मान्यताओं के अनुसार हर मनुष्य अमीरी का इच्छुक रहता है ताकि उसे दूसरे लोग बड़ा आदमी समझें और इज्जत करें।
अमीरी सीधे रास्ते नहीं आ सकती। उसके लिए टेढ़े रास्ते अपनानंे पड़ते हैं। हर समाज और देश की अर्थ व्यवस्था का एक स्तर होता है। उत्पादन, श्रम और क्षमता के आधार पर दौलत बढ़ती है। देश में वैसे साधन न हों तो सर्वसाधारण को गुजारें भर के लिए ही दौलत मिल सकती है। अपने देश की स्थिति आज ऐसी ही है, जिसमें किसी प्रकार निर्वाह चलता रहे तो पर्याप्त है। औसत देशवासी की परिस्थिति से अपने को मिलाकर काम चलाऊ आजीविका से संतोष करना चाहिए । हम सब एक तरह का जीवन जीते हैं और ईर्ष्या, असंतोष का अवसर नहीं आने देते, इतना ही सोचना पर्याप्त है।
अमीरी की ललक पैदा करना, सीधा मार्ग छोड़कर टेढ़ा अपनाने को कदम बढ़ाना है, पिछले दिनों अनैतिक मार्ग अपनाने वाले, अमीरी इकट्ठी कर लेने वाले, इज्जत आबरू वाले बड़े आदमी माने जाते रहे होंगे, पर अब वे दिन लद चुके। अब समझदारी बढ़ रही है। दौलत अब बेइज्जती की निशानी बनती चली जा रही है। लोग सोचते हैं, यह आँधे मार्ग अपनाने वाला आदमी है। यदि सीधे मार्ग से कमाता है तो भी ईमानदारी का तकाजा है कि देशवासियों के औसत वर्ग की तरह जिए और बचत को लोक-मंगल के लिए लौटा दे। यदि ऐसा नहीं किया जाता, बढ़ी हुई कमाई को ऐय्याशी में, बड़प्पन के अहंकारी प्रदर्शन में खर्च किया जाता है अथवा बेटे-पोतों के लिए जोड़ा जमा किया जाता है तो ऐसा कर्तव्य विचारशीलता की कसौटी पर अवांछनीय ही माना जाएगा ।
उपप्रवर्तक अमृत मुनि ने कहा कि अमीरी अब निस्संदेह बेइज्जती की निशानी बनती चली जा रही है और वह दिन दूर नहीं, जब अमीरों को समाज का घृणित, अनैतिक एवं निष्ठुर वर्ग माना जाएगा । हमें संदेह हैं कि अमीरी अब पचास वर्ष भी जीवित रह सकेगी। विवेकशीलता उसे छोड़ने के लिए बाध्य करेगी अन्यथा कानून अथवा विद्रोह उसका अंत कर देगा । मामूली आमदनी के लोग जब अपनी स्त्रियों के बक्से कीमती साड़ियों से भरते हैं और जेवरों में धन गँवाते हैं तब उसके पीछे यही ओछापन काम करता है कि ऐसी सजी-धजी हमारी औरतों को देखकर लोग हमें अमीर मानेंगे । पुरूष साड़ी. जेवर तो नहीं पहनते, पर सूट-बूट, घड़ी, छड़ी उनकी भी कीमती होती है ताकि मित्रों के आगे बढ़-चढ़कर शेखी मार सके। विवाह शादियों के वक्त यह ओछापन हद दर्जे को पहुँच जाता है । स्त्रियाँ ऐसे कपड़े लटकाए फिरती है जैसे सिनेमा, नाटक के नट लोग पहनते हैं । बरातियों का औघड़पन देखते ही बनता है। ऐसा ठाट-बाट बनाते हैं मानों कोई बड़े मिल मालिक, जागीरदार, अफसर अथवा सेठ साहूकार हो । इस अवसर पर महेश मुनि, अखिलेश मुनि तथा डॉ वरुण मुनि का भी सान्निध्य प्राप्त हुआ।
संघ के अध्यक्ष एडवोकेट सुरेश नागौरी एवं महामंत्री एडवोकेट रोशनलाल जैन ने बताया कि इस अवसर पर सादड़ी संघ के प्रवासी जैन समाज के वरिष्ठ श्रावक श्रविका गुरु दर्शन हेतु उपस्थित रहे और धर्म सभा में श्राविकाओं ने तपस्या के प्रत्याख्यान ग्रहण किए।
दौलत अब बेइज्जती की निशानी बनती जा रही-प्रवर्तक सुकन मुनि
