मीरा समाज में साहस, तपस्वी की प्रेरणा – प्रो. सारंगदेवोत

मीरा के काव्यों का विदेशों में हो रहा शोध – प्रो. सारंगदेवोत
स्त्री स्मिता की प्रतीक है मीरा – प्रो. मलय पानेरी
संत होना ही मीरा को वैश्विक संदर्भ में स्थापित करता है – प्रो. भटट्

उदयपुर 18जून / जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठडीम्ड टू बी विश्वविद्यालय के संस्थापक मनीषी पंडित जनार्दनराय नागर की 112वीं जयंती पर आयोजित सात दिवसीस समारेाह के तहत रविवार को मीरा अध्ययन एवं शोध संस्थान की ओर से कुलपति सचिवालय के सभागार में वैश्विक संदर्भ में संत मीरा विषयक पर आयोजित एक दिवसीय संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत ने कहा कि मीरा विश्व में साहस, तपस्या की द्योतक है। ‘‘ वसुधैव कुटुम्बकम एवं सर्वे भवंतु सूखिन् ’’ जैसी प्रासंगिकता को मीरा चरितार्थ करती है। मीरा स्त्री संघर्ष एवं स्त्री मुक्ति की पर्याय है। उन्होने कहा कि रजनीश जैसे विद्वानों  ने मीरा को तीर्थंकर माना है यानि की वो अपने आप में एक तीर्थ थी। विवेकानंद के अनुसार मीरा को विश्व पटल पर संत की उपाधि दी है। भक्तिकाल में 500 वर्ष पूर्व मीरा से पहले कोई रचनाकर नहीं था जिसने स्त्री चरित्र को विश्व पटल पर रखा। संत  व पंत की भिन्नता में मीरा के प्रति समाज का दृष्टिकोण बदला तथा आज के संदर्भ में मीरा को अखण्ड भारत में स्थापित किया। संत परम्परा ने तत्कालीन समय में भारतीय साहित को संरक्षण दिया जिसमें मीरा का भी प्रमुख स्थान है। उन्होने कहा कि मीरा के भक्ति काव्य का विदेशों ने भी लोहा माना।

वक्ता सहायक आचार्य  डॉ. प्रिति भटट् ने कहा कि  मीरा सर्वत्र है तथा सम्पूर्ण मानव मात्र की प्रेरणा एवं स्त्री चेतना की द्योतक है। इतिहास में मीरा को जो स्थान मिलना चाहिए था वो उन्हे नहीं मिला। मीरा स्त्रीवादी आंदोलनों की उपज थी उन्होंने परमेश्वर को पति माना और उनमें भक्तिवादी परम्परा से उसमें भक्तिमयी हो गयी। इस पूरे क्रम में विभिन्न क्षेत्रों में अकयधित यातनाओं के साथ वो समय बहुत ही संघर्षपूर्ण था। पुरूषों के भक्ति आयामों की परम्परा को तोड कर आधुनिक स्त्री के रूप में स्थापित किया। मीरा की भक्ति, विचार, व्यवहार के साथ समाज के विभिन्न क्षेत्रो में प्रेरणा स्वरूप चरितार्थ  होती है। संत की परिभाषा को चरितार्थ करते हुए कहा कि संत शब्द ही मीरा को वैश्विक संदर्भ की धरातल पर स्वतः ही स्थापित कर देता है।

वक्ता प्रो. मलय पानेरी ने कहा कि मीरा स्त्री समाज की अस्मिता का प्रतीक है। मीरा अनेक यातनाओं को सहकर मानसिक रूप से मजबूत हुई। पुरूष वर्चस्ववादी व्यवस्था के विरोध में स्वतंत्रता का परचम फहराया। संगोष्ठी का शुभारंभ मॉ सरस्वती प्रतिमा पर पुष्पांजलि एवं दीप प्रज्जलित कर किया। संचालन डॉ. यज्ञ आमेटा ने किया जब कि आभार डॉ. चन्द्रेश छतलानी ने जताया।

इस अवसर पर डॉ. तरूण श्रीमाली, डॉ. पारसजैन, डॉ. भवानीपाल सिंह राठौड़, भगवती लाल सोनी, डॉ. हीना खान, डॉ. शिल्पा कठालिया, डॉ. प्रेरणा भाटी, डॉ. मान सिंह चुण्डावत, गजेन्द्र सिंह, डॉ. मधू मुर्डिया, डॉ. आशीष नंदवाना, डॉ. कुलशेखर व्यास, उमराव सिंह राणावत, रतनडांगी, डॉ. हेमंत साहू, लहरनाथ, डॉ. वीणा द्विवेदी, डॉ. संजय चौधरी, कृष्णकांत कुमावत, डॉ. दिलीप चौधरी, रतन डांगी, जितेन्द्र सिंह चौहान, मनोज यादव, डॉ. ललित सालवी, दुर्गाशंकर , मुकेशनाथ,  सहित विद्यापीठ के डीन, डायरेक्टर एवं कार्यकर्ता उपस्थित थे।
उक्त जानकारी निजी सचिव कृष्णकांत कुमावत ने दी।

By Udaipurviews

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