टीआरआई द्वारा प्रायोजित गवरी मंचन की अंतिम कड़ी बुधवार को शिल्पग्राम में

उदयपुर व्यूज़ | ताजा खबरें

उदयपुर, 29 सितम्बर। जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा वार्षिक कार्य योजना 2026-27 के तहत स्वीकृत प्लान के तहत जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग, राजस्थान सरकार के तत्वावधान में माणिक्य लाल वर्मा आदिम जाति शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान (टीआरआई) द्वारा मेवाड़ अंचल की भील जनजाति की प्रसिद्ध परम्परागत लोकनृत्य नाटिका ‘गवरी’ का मंचन करवाया जा रहा है।

निदेशक ओपी जैन बताया कि टीआरआई द्वारा माह सितम्बर में उदयपुर जिले में सहेलियों की बाड़ी, फतहसागर पाल, भारतीय लोककला मण्डल में गवरी मंचन करवाया जा चुका है। इस क्रम में बुधवार 30 सितम्बर को शिल्पग्राम में इस सीजन की अंतिम गवरी का मंचन करने हेतु तहसील झाड़ोल के गांव निचली गोरण के मुखिया गौरी शंकर पारगी के दल को आमंत्रित किया गया। उन्होंने बताया कि इस आयोजन हेतु टीएडी आयुक्त सुश्री प्रज्ञा केवलरमानी, अति निदेशक, ओटीसी बंसीधर कुमावत,, वरिष्ठ कलाकार एवं सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी दिनेश कोठारी, महावरी खराड़ी, अति आयुक्त टीएडी कृष्णपाल सिंह को समापन गवरी मंचन हेतु अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। जो विधिवत पूजा कर गवरी दल के मुख्य पात्र शिव के प्रतीक बुड़िया, माँ पार्वती के प्रतीक राई, गवरी मुख्य संचालक कुटकुडिया, भोपाजी एवं अन्य गवरी दल सदस्यों का माल्यार्पण से स्वागत करेंगे। गवरी मंचन में दल के लगभग 40 से 50 सदस्यों द्वारा सम्पूर्ण दिवस गवरी की विभिन्न घाई एवं लघु नाटिकाओं का प्रदर्शन किया गया एवं इस धार्मिक परम्परागत नृत्य नाटिका का उपस्थित पयर्टकों एवं शहरवासियों ने श्रद्धा भाव से आनन्द ले सकते हैं।

उल्लेखनीय है कि गवरी लोकनृत्य मां पार्वती (गौरज्या) की प्रति अटूट श्रद्धा का पर्व है। जिसमें ये मान्यता है कि मां पार्वती (गौरज्या) सवा महीने के लिए मायके (मेवाड़) आती है। भील समाज उन्हें बेटी मानकर खेलों एवं प्रसंगों के जरिये उनका सत्कार, मनोरंजन करता है। नाट्य का मुख्य कथानक भगवान शिव एवं भस्मासुर की पौराणिक कथा पर आधारित है जिसमें मुख्य पात्र राया (शिवजी) और बुड़िया (भस्मासुर) है। मां गौरज्या के प्रति आदिवासी समाज की आस्था का सबसे बड़ा प्रमरण यही है कि ये लोग इस नृत्य अनुष्ठान के दौरान पूर्ण संयमित जीवन व्यतीत करते है तथा 40 दिन तक घर नहीं जाते है, नंगे पाव चलते है तथा जमीन पर सोते है तथा दिन में सिर्फ एक बार सात्विक भोजन लेते है। जिसमें हरि सब्जी, प्याज लहसून, मास-मदिरा पूरी तरह वर्जित होता है। इसका रोचक तथ्य यह है कि इसमें महिला पात्रों का अभिनय भी पुरूष कलाकार करते हैं। गड़ावण (प्रतिमा स्थापना) से वलावण (विसर्जन) की कुल अवधि 40 दिवस रहती है।

By Udaipurviews

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