उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में मंगलवार को आयोजित नियमित व्याख्यान में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने आत्मिक शांति और अनुभूति का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि जीवन में शांति और समाधि चाहिए तो आत्मा में रहना सीखना होगा। शरीर, इंद्रियों और बाहरी पदार्थों में अधिक उलझाव जीवन में अशांति और कष्ट का कारण बनता है।
उन्होंने चूड़ियों का उदाहरण देते हुए कहा कि एक चूड़ी से आवाज नहीं होती, आवाज के लिए दो या अधिक चूड़ियां आवश्यक हैं। इसी प्रकार आत्मा जब बाहरी पदार्थों में उलझती है तो जीवन में अनेक प्रकार का कोलाहल पैदा होता है।
साध्वीश्री ने कहा कि केवल ज्ञान को बोलकर व्यक्त करना पर्याप्त नहीं, उसे भीतर से महसूस करना ही वास्तविक अनुभूति है। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन दुर्लभ अवसर है। पर्युषण और चातुर्मास आध्यात्मिक साधना का विशेष समय हैं, इसलिए मौज-शौक कम कर आराधना, संयम और परमात्मा की भक्ति में समय लगाना चाहिए। साध्वी प्रज्ञानजना, नमन रुचि, योगरुचि व तन्मय रुचि श्रीजी ने गीत प्रस्तुत किया।
बाहरी प्रभावों से नहीं, आत्मा के स्वभाव में रहकर मिलेगी शांति रू साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी
