मातृभूमि के गौरव और विस्मृत शौर्य को जन-जन तक पहुंचाना आज की आवश्यकता: आलोक कुमार

उदयपुर व्यूज़ | ताजा खबरें

—दिवेर विजय महोत्सव 2026 में बोले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहसरकार्यवाह
—प्रताप गौरव केन्द्र ‘राष्ट्रीय तीर्थ’ में चल रहे विशेष आयोजन
—राष्ट्रीय चित्रकला कार्यशाला में 21 सितंबर को विशेष सत्र

उदयपुर, 20 सितम्बर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहसरकार्यवाह आलोक कुमार ने कहा कि राष्ट्र का गौरव केवल वर्तमान की उपलब्धियों से नहीं, बल्कि अपने उन शौर्यगाथाओं और बलिदानों को स्मरण करने से भी निर्मित होता है, जिन्हें इतिहास के पन्नों में पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाया।

वे रविवार को यहां वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति के अंतर्गत संचालित प्रताप गौरव केन्द्र ‘राष्ट्रीय तीर्थ’ के पद्मिनी सभागार में दिवेर विजय महोत्सव के तहत आयोजित विशेष उद्बोधन कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि देश के युवाओं और समाज को अपने पूर्वजों के पराक्रम, त्याग और मातृभूमि के प्रति समर्पण की गाथाओं से परिचित कराना आवश्यक है, ताकि राष्ट्रभाव आने वाली पीढ़ियों के मन में और अधिक सशक्त हो।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में आलोक कुमार ने कहा कि इतिहास के ऐसे अनेक गौरवपूर्ण अध्याय हैं, जिनके माध्यम से समाज में राष्ट्रभक्ति और आत्मगौरव की भावना को और मजबूत किया जा सकता है। उन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में लगभग 90 हजार पाकिस्तानी सैनिकों से आत्मसमर्पण कराया था। इसके बाद शिमला समझौता हुआ, लेकिन इस ऐतिहासिक सैन्य विजय और इतने बड़े आत्मसमर्पण की गाथा को देश के सामान्य विमर्श और पाठ्यक्रमों में अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया। उन्होंने कहा कि पूर्व सैनिक सेवा परिषद ने देश में विजय दिवस मनाने की मांग उठाई और लंबे प्रयासों के बाद आज यह सैन्य संस्थानों और सुरक्षा बलों के बीच उस विजय की स्मृति के रूप में स्थापित हुआ है। उन्होंने इसे इस बात का उदाहरण बताया कि राष्ट्रहित में किया गया छोटा-सा प्रयास भी समय के साथ व्यापक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है।

आलोक कुमार ने दिवेर के युद्ध को भी भारतीय इतिहास के उन गौरवपूर्ण अध्यायों में बताया, जिन्हें नई पीढ़ी तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप का संघर्ष केवल मेवाड़ की स्वतंत्रता का संघर्ष नहीं था, बल्कि स्वाभिमान, स्वतंत्रता और मातृभूमि के सम्मान के लिए अदम्य संकल्प का प्रतीक है।

उन्होंने अहिल्याबाई होल्कर के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के इतिहास में ऐसी अनेक वीरांगनाएं हुई हैं, जिन्होंने शासन, समाज और संस्कृति के क्षेत्र में असाधारण कार्य किए। उन्होंने महेश्वर में अहिल्याबाई होल्कर की कार्यशैली का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने अपने संसाधनों का उपयोग देशभर के तीर्थों के पुनरुद्धार, समाजहित और जनकल्याण के लिए किया। उन्होंने कहा कि देश के 40 से अधिक प्रमुख तीर्थों के पुनरुद्धार और समाज के विभिन्न वर्गों के लिए किए गए उनके कार्यों को भी व्यापक रूप से सामने लाने की आवश्यकता है।

सहसरकार्यवाह ने कहा कि इतिहास की खोज केवल प्रसिद्ध व्यक्तित्वों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान पूर्वोत्तर भारत, जनजातीय समाज और देश के अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों के योगदान को भी सामने लाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि दस्तावेजों और अभिलेखागारों में ऐसे अनेक ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हैं, जिनसे भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की व्यापकता और उसमें समाज के विभिन्न वर्गों की भूमिका सामने आती है।

उन्होंने 1857 के संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि लंबे समय तक इसे अंग्रेजी सत्ता के दस्तावेजों में सैनिक विद्रोह के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि इसके पीछे व्यापक जनप्रतिरोध और स्वतंत्रता की भावना थी। उन्होंने कहा कि इतिहास के इन उपेक्षित और विस्मृत अध्यायों को प्रमाणों के साथ सामने लाना आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भारत की स्वतंत्रता और उसके लिए किए गए संघर्ष की व्यापक तस्वीर समझ सकें।

आलोक कुमार ने कहा कि इतिहास को समग्रता से समझने के लिए सत्ता परिवर्तन, संघर्ष और भारतीय शक्तियों के योगदान को व्यापक संदर्भ में देखना आवश्यक है। देश की पहचान केवल आधुनिक उपलब्धियों से नहीं बनती, बल्कि हजारों वर्षों की सांस्कृतिक परंपरा, संघर्ष, बलिदान और राष्ट्रनिष्ठा से बनती है। इसलिए आवश्यक है कि जिन वीरों, वीरांगनाओं और राष्ट्रनायकों की गाथाएं इतिहास के किसी कोने में दब गई हैं, उन्हें प्रमाणों के साथ समाज के सामने लाया जाए।

उन्होंने प्रताप गौरव केन्द्र की स्थापना के उद्देश्य का उल्लेख करते हुए कहा कि उदयपुर में विश्व की बड़ी-बड़ी होटलें और पर्यटन स्थल हैं, लेकिन उदयपुर की वास्तविक पहचान जिस इतिहास, संस्कृति और महाराणा प्रताप के शौर्य से जुड़ी है, उसे जन-जन तक पहुंचाने के लिए ऐसे संस्थानों की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि प्रसन्नता की बात है कि प्रताप गौरव केन्द्र इस उद्देश्य की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है।

दिवेर विजय महोत्सव के सह संयोजक डॉ. देवेन्द्र श्रीमाली ने बताया कि कार्यक्रम में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति के अध्यक्ष प्रो. भगवती प्रकाश शर्मा, दिवेर विजय महोत्सव के संयोजक रमन सूद और सह संयोजक हरीश राजानी भी मंचासीन थे। कार्यक्रम का आरंभ वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। संचालन डॉ. विवेक भटनागर ने किया।

निदेशक अनुराग सक्सेना ने बताया कि दिवेर विजय पर आधारित नुक्कड़ नाटक ‘दिवेर का रणघोष’ का मंचन रविवार को फतहसागर के झरने वाले छोर पर किया गया। सोमवार शाम 5 से 6 बजे के बीच हिरणमगरी सेक्टर—4 चौराहे पर मंचन किया जाएगा।

चित्रकला कार्यशाला संयोजक प्रो. रामसिंह भाटी ने बताया कि प्रताप गौरव केन्द्र “राष्ट्रीय तीर्थ” में ‘दिवेर विजय महोत्सव 2026’ के उपलक्ष्य में 19 से 26 सितम्बर 2026 तक राष्ट्रीय चित्रकला कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। इसका मुख्य विषय “मेवाड़ का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक परिदृश्य” रखा गया है। यह आयोजन उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, पटियाला (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार) एवं प्रताप गौरव केन्द्र के संयुक्त तत्वावधान में, संस्कार भारती उदयपुर महानगर इकाई के सहयोग से हो रहा है। कार्यशाला के तहत 21 सितंबर को प्रातः 10:00 से 11:30 बजे विशेष सत्र रहेगा। इसमें जम्मू-कश्मीर के प्रसिद्ध चित्रकार अंकुश कुमार द्वारा लाइव आर्ट डिमॉन्स्ट्रेशन व कला संवाद किया जाएगा।

By Udaipurviews

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