रक्षाबंधन पर सजे बाजार, बहनों ने बांधी राखी, भाइयों ने लिया रक्षा का संकल्प
-प्रेमलता लोहार
उदयपुर। सावन की फुहारों के बीच जब कलाई पर रंग-बिरंगी राखी सजी तो भाई-बहन के रिश्ते में प्रेम, विश्वास और अपनत्व के रंग भी और गहरे हो गए। रक्षाबंधन के पर्व पर घर-आंगन से लेकर बाजार तक उत्सव का माहौल नजर आया। बहनों ने भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर उनकी लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना की तो भाइयों ने भी बहनों की सुरक्षा, सम्मान और हर सुख-दुःख में साथ निभाने का संकल्प लिया। कहीं बहनें दूर शहरों से मायके पहुंचीं तो कहीं भाइयों ने बहनों के घर जाकर इस रिश्ते की मिठास कायम रखी।

राखियों से सजे बाजार, खरीदारी को लेकर दिखा उत्साह
रक्षाबंधन से पहले ही शहर के प्रमुख बाजार रंग-बिरंगी राखियों से सज गए। दुकानों पर पारंपरिक रेशमी राखियों के साथ बच्चों के लिए कार्टून कैरेक्टर, आकर्षक डिजाइन और आधुनिक राखियों की मांग रही। चांदी की राखी, रुद्राक्ष, मोती, कलावा और धार्मिक प्रतीकों वाली राखियां भी लोगों को खूब पसंद आईं। मिठाई की दुकानों पर भी विशेष तैयारियां देखने को मिलीं। घेवर, मिठाई, नमकीन और ड्राई फ्रूट्स की खरीदारी के लिए लोगों की भीड़ रही।
बाजारों में केवल राखी ही नहीं, बल्कि भाई के लिए कपड़े, बहन के लिए उपहार, मिठाई और पूजा सामग्री खरीदने वालों की भी चहल-पहल रही। व्यापारियों के अनुसार त्योहार ने बाजार में अच्छी रौनक बढ़ाई और लंबे समय बाद बाजार में पारिवारिक खरीदारी का ऐसा माहौल देखने को मिला।
पौराणिक इतिहास में भी राखी का विशेष स्थान
रक्षाबंधन केवल भाई की कलाई पर धागा बांधने का पर्व नहीं है, बल्कि इसके पीछे भारतीय संस्कृति और पौराणिक परंपराओं की लंबी विरासत जुड़ी है। पुराणों और लोक परंपराओं में रक्षा-सूत्र बांधने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी से जुड़ा प्रसंग भी इस पर्व की भावनात्मक गहराई को दर्शाता है। मान्यता है कि द्रौपदी ने भगवान कृष्ण की उंगली से निकले रक्त को रोकने के लिए अपनी साड़ी का कपड़ा बांधा था और श्रीकृष्ण ने उनके सम्मान की रक्षा का संकल्प निभाया।
इसी तरह राजा बलि और माता लक्ष्मी से जुड़ी कथा भी रक्षाबंधन के सांस्कृतिक महत्व को सामने रखती है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस पर्व को अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाया जाता है, लेकिन मूल भावना एक ही है—रिश्तों की रक्षा और प्रेम का संकल्प।
बहनों की उम्मीद—भाई केवल रक्षा नहीं, सम्मान भी दे
आज रक्षाबंधन की भावना केवल शारीरिक सुरक्षा तक सीमित नहीं रह गई है। बहनों की अपने भाइयों से अपेक्षा है कि वे जीवन के हर मोड़ पर उनके साथ खड़े रहें। बहनों के लिए भाई का साथ तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब परिवार में कोई कठिन परिस्थिति आए, निर्णय लेने की स्थिति हो या भावनात्मक सहारे की जरूरत हो।

आज की बहनें चाहती हैं कि भाई उन्हें कमजोर समझकर संरक्षण देने के बजाय बराबरी का सम्मान दें। उनकी शिक्षा, करियर, निर्णय और स्वतंत्र पहचान का सम्मान करें। ऐसे में राखी का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होता है, जब भाई अपनी बहन की सुरक्षा के साथ उसके सम्मान, अधिकार और आत्मनिर्भरता की भी रक्षा करे।
भाइयों का कर्तव्य—राखी का वचन जीवनभर निभाना
राखी बांधते समय भाई द्वारा दिया गया उपहार या बहन को कुछ रुपये देना परंपरा का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इस पर्व का सबसे बड़ा उपहार भाई का विश्वास और साथ है। भाई का कर्तव्य है कि वह बहन को केवल त्योहार के दिन याद न करे, बल्कि उसके जीवन के प्रत्येक सुख-दुःख में सहभागी बने।
बहन के प्रति सम्मान, माता-पिता की जिम्मेदारियों में सहयोग, बहन के बच्चों के प्रति अपनापन और पारिवारिक रिश्तों को बनाए रखना भी इसी जिम्मेदारी का हिस्सा है। राखी की डोर छोटी जरूर होती है, लेकिन उससे जुड़ा वचन जीवनभर का होता है।
संयुक्त परिवार में रक्षाबंधन का आनंद ही अलग
सामूहिक और संयुक्त परिवारों में रक्षाबंधन का पर्व रिश्तों को और मजबूत करने का अवसर बन जाता है। एक ही घर में दादा-दादी, माता-पिता, भाई-बहन और बच्चे जब एक साथ त्योहार मनाते हैं तो नई पीढ़ी को पारिवारिक संस्कार और रिश्तों की अहमियत सहज रूप से समझ आती है।

आज जब नौकरी, शिक्षा और बेहतर अवसरों के कारण परिवार अलग-अलग शहरों में रहने लगे हैं, ऐसे समय में रक्षाबंधन जैसे पर्व परिवार को फिर एक साथ लाने का माध्यम बन सकते हैं। एक साथ बैठकर पूजा करना, बहनों का राखी बांधना, बड़ों का आशीर्वाद लेना और फिर परिवार के साथ भोजन करना केवल परंपरा नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत करने वाली प्रक्रिया है।
रिश्तों की मिठास बनाए रखने का संदेश
रक्षाबंधन का सबसे बड़ा संदेश यही है कि रिश्ते केवल खून से नहीं, बल्कि विश्वास, सम्मान और जिम्मेदारी से मजबूत होते हैं। राखी का धागा कलाई पर कुछ समय के लिए बंधता है, लेकिन उसका भाव पूरे जीवन साथ रह सकता है। जरूरत इस बात की है कि त्योहार केवल रस्म बनकर न रह जाए।
भाई बहन के सम्मान और अधिकार की रक्षा करे, बहन भाई के सुख-दुःख में सहभागी बने और पूरा परिवार एक-दूसरे के प्रति प्रेम व संवेदना बनाए रखे। यही रक्षाबंधन की सच्ची भावना है और यही वह परंपरा है, जो बदलते समय में भी भारतीय परिवारों को भावनात्मक रूप से जोड़े रख सकती है।
