उदयपुर, 26 अगस्त। भारत में स्किलिंग की सबसे बड़ी चुनौती अब प्रशिक्षण केंद्रों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि हर विद्यार्थी तक सस्ती, गुणवत्तापूर्ण, आधुनिक और रोजगार से जुड़ी स्किलिंग पहुंचाना है। इसके लिए हर कॉलेज में महंगी मशीनें और अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं खड़ी करने के बजाय जिला स्तर पर साझा स्किलिंग हब विकसित किए जा सकते हैं, जहां सरकारी, निजी और ट्रस्ट संचालित संस्थानों के विद्यार्थी एक ही अत्याधुनिक लैब और वर्कशॉप का उपयोग कर सकें।
यह महत्वपूर्ण सुझाव नीति आयोग की इसी माह अगस्त में जारी रिपोर्ट ‘री-इमैजिनिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत@2047’ में सामने आया है। रिपोर्ट ने देश की पूरी स्किलिंग व्यवस्था को प्रशिक्षण-केंद्रित मॉडल से निकालकर शिक्षा, कौशल, काम, रोजगार, आजीविका के समग्र मॉडल में बदलने की जरूरत बताई है। रिपोर्ट का मूल दर्शन है कि स्किलिंग को जीवनभर चलने वाली प्रक्रिया बनाया जाए और सफलता का पैमाना केवल प्रशिक्षण या प्रमाण-पत्र नहीं, बल्कि आगे बढ़ने, सीखने की क्षमता और प्रभावी रोजगार, आजीविका हो।
रिपोर्ट के अनुसार 2014-15 से अब तक देश में 7.67 करोड़ से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया जा चुका है। केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के माध्यम से वर्ष 2025-26 में स्किलिंग से जुड़े कार्यों के लिए करीब 34 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया। इसके बावजूद प्रशिक्षण के परिणाम अभी समान नहीं हैं और स्किल, रोजगार तथा आजीविका के बीच एक मजबूत कड़ी स्थापित करने की जरूरत है।
डिग्री है, लेकिन डिग्री के अनुरूप रोजगार जरूरी
विद्या भवन पॉलिटेक्निक के प्राचार्य डॉ. अनिल मेहता ने कहा कि रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण संदेश उच्च शिक्षा के लिए है। देश में बड़ी संख्या में विद्यार्थी डिग्री हासिल कर रहे हैं, लेकिन डिग्री और रोजगार के बीच गंभीर अंतर है।
बीए, बीएससी और बीकॉम जैसे सामान्य डिग्री कार्यक्रमों का रोजगार से संबंध कमजोर है और अनेक विद्यार्थी इन्हें मुख्यतः सरकारी नौकरियों की पात्रता के लिए चुनते हैं।
डॉ. मेहता ने कहा कि इसका अर्थ यह नहीं कि बीए, बीकॉम या बीएससी जैसे पाठ्यक्रम अप्रासंगिक हैं। जरूरत यह है कि इनमें रोजगारपरक कौशल और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़े विशेषज्ञता क्षेत्र जोड़े जाएं ।उदाहरण के लिए बीकॉम के साथ डिजिटल मार्केटिंग, एनालिटिक्स, बीएससी के साथ डेटा एनालिटिक्स, बीए के साथ पर्यटन, हॉस्पिटैलिटी, इंजीनियरिंग डिप्लोमा, डिग्री के साथ ईवी टेक्नोलॉजी, सोलर टेक्नोलॉजी, सी एन सी व ऑटोमेशन जोड़े जाने चाहिए।
हर संस्थान को हर लैब बनाने की जरूरत नहीं :
डॉ. मेहता ने कहा कि नीति आयोग ने स्किलिंग के क्षेत्र में मौजूदा प्रशिक्षण संस्थानों, प्रयोगशालाओं, वर्कशॉप, हॉस्टल और अन्य संसाधनों के बिखरे हुए एवं कम उपयोग को एक बड़ी समस्या माना है। इसलिए राज्य/राष्ट्रीय स्तर पर साझा स्किलिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क तथा जिला-केंद्रित क्रियान्वयन की बात कही गई है। यही विचार जिला स्तर पर ‘डिस्ट्रिक्ट स्किलिंग हब’ के रूप में लागू किया जा सकता है।
एक जिले में मौजूद आईटीआई, पॉलीटेक्निक, इंजीनियरिंग कॉलेज, विश्वविद्यालय, सरकारी कॉलेज, सक्षम निजी एवं ट्रस्ट संचालित संस्थान तथा उद्योगों की प्रयोगशालाओं और वर्कशॉप की मैपिंग कर साझा नेटवर्क बनाया जाए।
यदि किसी संस्थान में सीएनसी मशीनिंग की सुविधा है, दूसरे में ईवी और ऑटोमोबाइल, तीसरे में रोबोटिक्स एवं ऑटोमेशन, और किसी उद्योग में अत्याधुनिक मैन्युफैक्चरिंग या डिजिटल तकनीक उपलब्ध है, तो इन सभी को जिले की साझा स्किलिंग संपदा माना जाए।विद्यार्थियों को निर्धारित समय-सारणी के अनुसार इन सुविधाओं में प्रशिक्षण दिया जा सकता है।मूल सिद्धांत होना चाहिए कि हर संस्थान को हर लैब बनाने की जरूरत नहीं, लेकिन हर विद्यार्थी को जरूरी लैब तक पहुंच जरूर मिलनी चाहिए।
यह मॉडल विशेष रूप से उन निजी और ट्रस्ट संचालित संस्थानों के लिए उपयोगी होगा जिनके पास भवन, शिक्षक और विद्यार्थी हैं, लेकिन अत्याधुनिक मशीनों और तकनीकी प्रयोगशालाओं में लगातार करोड़ों रुपए निवेश करने की क्षमता नहीं है।
स्किलिंग महंगी है, लेकिन समाधान केवल लोन नहीं :
डॉ. मेहता ने कहा कि स्किलिंग की दूसरी बड़ी चुनौती लागत है। विद्यार्थी के लिए स्किलिंग का खर्च केवल कोर्स फीस नहीं है। इसमें प्रशिक्षण सामग्री, उपकरण, यात्रा, डिजिटल सुविधा, आवास तथा प्रशिक्षण अवधि में संभावित आय का नुकसान भी शामिल है।
नीति आयोग ने भी माना है कि आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए महंगे प्रशिक्षण और केवल ऋण आधारित वित्तीय व्यवस्था पर्याप्त समाधान नहीं हो सकती। रिपोर्ट में लक्षित स्किल वाउचर, छात्रवृत्ति और वित्तीय सहायता जैसे विकल्पों पर जोर है। इसका अर्थ है कि गरीब विद्यार्थी की आर्थिक स्थिति उसके कौशल और रोजगार की राह में बाधा नहीं बननी चाहिए।।विद्यार्थी को मान्यता प्राप्त संस्थान या कोर्स चुनने की स्वतंत्रता देते हुए सहायता को विद्यार्थी के साथ जोड़ना अधिक प्रभावी हो सकता है।
संस्थानों की आर्थिक समस्या का समाधान भी साझा निवेश :
स्किलिंग की चुनौती केवल विद्यार्थी की आर्थिक क्षमता की नहीं है। छोटे कॉलेज, पॉलीटेक्निक, आईटीआई और ट्रस्ट संचालित संस्थान अत्याधुनिक रोबोटिक्स, ऑटोमेशन, ईवी, एआई, सौर ऊर्जा, सीएनसी और अन्य तकनीकी प्रयोगशालाओं में लगातार निवेश करने में सक्षम नहीं होते। इसलिए सरकार, शिक्षण संस्थान, उद्योग साझेदारी जरूरी है।
सरकार कैपिटल सपोर्ट, वायबिलिटी गैप फंडिंग, छात्रवृत्ति और स्किल वाउचर उपलब्ध करा सकती है।शिक्षण संस्थान भवन, कक्षाएं, शिक्षक और विद्यार्थियों तक पहुंच उपलब्ध करा सकते हैं। उद्योग मशीनरी, तकनीक, विशेषज्ञ प्रशिक्षक, पाठ्यक्रम इनपुट, मेंटेनेंस, अप्रेंटिसशिप और रोजगार के अवसर उपलब्ध करा सकते हैं। इससे उद्योग केवल सीएसआर के तहत मशीन देने वाला पक्ष नहीं रहेगा, बल्कि स्किलिंग का दीर्घकालिक सह-भागीदार बनेगा।
उदयपुर में छह वर्ष पहले जमीन पर उतरा मॉडल।:
डॉ. मेहता ने कहा कि नीति आयोग का साझा स्किलिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर और उद्योग-आधारित प्रशिक्षण का विचार उदयपुर के लिए नया नहीं है। करीब छह वर्ष पहले उदयपुर में इसका एक व्यावहारिक मॉडल जमीन पर उतारा जा चुका है।प्रसिद्ध उद्योगपति सलिल सिंघल की प्रेरणा से विद्या भवन में स्थापित ‘सरस्वती मेकेट्रोनिक्स सेंटर’ इसका उदाहरण है। इस केंद्र में सीएनसी, ऑटोमेशन, रोबोटिक्स और मेकेट्रोनिक्स जैसी आधुनिक तकनीकों पर प्रशिक्षण की सुविधाएं विकसित की गई हैं। यहां स्कॉलरशिप की सुविधा भी उपलब्ध है।
इस प्रकार का मॉडल यह दिखाता है कि यदि उद्योग की तकनीकी जरूरत, शिक्षण संस्थान का परिसर और प्रशिक्षण की व्यवस्था एक साथ लाई जाए तो सीमित संसाधनों में भी आधुनिक स्किलिंग संभव है।
आईटीआई और डिप्लोमा ‘दूसरी पसंद’ नहीं, रोजगार का मजबूत रास्ता बनें :
रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि आईटीआई और डिप्लोमा शिक्षा को सामाजिक रूप से कमतर मानने की मानसिकता बदलनी होगी।आईटीआई या डिप्लोमा को केवल उन विद्यार्थियों का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए जो पारंपरिक डिग्री नहीं कर पाए। इन्हें उच्च शिक्षा और रोजगार दोनों के समानांतर रास्ते के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय क्रेडिट फ्रेमवर्क के माध्यम से प्रमाण-पत्र, डिप्लोमा और डिग्री के बीच अधिक लचीली आवाजाही तथा अप्रेंटिसशिप और कार्य-अनुभव को सीखने की प्रक्रिया से जोड़ने की दिशा में व्यवस्था विकसित की जा रही है। इससे विद्यार्थी के लिए स्कूल पश्चात आईटीआई फिर डिप्लोमा और फिर डिग्री या स्कूल , डिग्री , कौशल विशेषज्ञता , अप्रेंटिसशिप और रोजगार या काम का अनुभव , कौशल प्रमाणन और फिर डिप्लोमा या डिग्री जैसे अवसर उपलब्ध है।
स्किलिंग कॉलेज से नहीं, स्कूल से शुरू हो :
डॉ. मेहता ने कहा कि रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण सुधार स्कूल शिक्षा में स्किलिंग को मुख्यधारा बनाना हैं।
नीति आयोग ने कक्षा 6 से 12 तक सभी विद्यार्थियों के लिए जनरल एम्प्लॉयबिलिटी एंड एंटरप्रेन्योरशिप स्किल्स (जीईईएस) शुरू करने का सुझाव दिया है। इसमें—संचार कौशल, कार्यात्मक अंग्रेजी, डिजिटल मूलभूत ज्ञान, वित्तीय साक्षरता, टीमवर्क, समस्या समाधान और उद्यमिता जैसे कौशल शामिल होंगे।
कक्षा 6 से 8 में स्थानीय उद्योग भ्रमण, परियोजना आधारित शिक्षा और उपलब्ध स्कूल प्रयोगशालाओं के माध्यम से विभिन्न व्यवसायों से परिचय कराया जा सकता है। कक्षा 9 व 10 में ‘कौशल ट्रैक’ के माध्यम से अधिक व्यवस्थित व्यावसायिक शिक्षा और कक्षा 11-12 में विशेषज्ञता, इंटर्नशिप तथा अप्रेंटिसशिप की दिशा में आगे बढ़ाया जा सकता है।
यहां भी वही सिद्धांत लागू होगा कि हर स्कूल में महंगी लैब बनाने के बजाय बड़े स्कूलों और जिला स्किलिंग हब को साझा संसाधन केंद्र बनाया जाए।
प्रशिक्षण नहीं, रोजगार परिणाम बने सफलता का पैमाना :
डॉ. मेहता ने कहा कि स्किलिंग व्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव यह होना चाहिए कि सफलता का पैमाना केवल ‘कितने विद्यार्थियों को प्रशिक्षित किया गया’ नहीं रहे बल्कि कितनों को रोजगार मिला? कितनों की आय बढ़ी? कितने छह या बारह महीने बाद भी रोजगार में बने रहे? कितनों ने अपना उद्यम शुरू किया? और कितनों ने आगे की शिक्षा या उच्च कौशल की ओर प्रगति की?
नीति आयोग की नई स्किलिंग आर्किटेक्चर में एम्प्लॉयबिलिटी, प्रोग्रेशन और लाइवलीहुड को सफलता के प्रमुख मानक बनाने की बात कही गई है। इससे प्रशिक्षण संस्थानों की जवाबदेही बढ़ेगी और केवल प्रमाण-पत्र बांटने के बजाय वास्तविक रोजगार और आजीविका परिणाम पर ध्यान केंद्रित होगा।
उदयपुर के लिए जिला स्किल डिमांड मैपिंग जरूरी :
डॉ. मेहता ने कहा कि इस मॉडल को उदयपुर में लागू करने का पहला कदम होना चाहिए—‘डिस्ट्रिक्ट स्किल डिमांड मैपिंग’। उद्योगों से पूछा जाए कि अगले पांच-दस वर्षों में उन्हें किस कौशल के कितने युवाओं की जरूरत होगी। उदयपुर के संदर्भ में मेकेट्रोनिक्स, ऑटोमेशन , पर्यटन, हॉस्पिटैलिटी, हस्तशिल्प, एमएसएमई, इंजीनियरिंग, बायो-इंजीनियरिंग, निर्माण, सौर ऊर्जा, डिजिटल टेक्नोलॉजी, साइबर सिक्योरिटी, कृषि एवं संबद्ध कार्य जैसे क्षेत्रों की भविष्य की रोजगार जरूरतों का आकलन किया जा सकता है।
इसके आधार पर स्कूलों, आईटीआई, पॉलीटेक्निक, कॉलेजों और उद्योगों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों को जोड़ा जाए।
इससे एक ही जिले में अलग-अलग संस्थानों द्वारा एक जैसे पाठ्यक्रम चलाने तथा महंगी सुविधाओं की अनावश्यक पुनरावृत्ति कम होगी और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा।
ट्रेनिंग इंडिया’ से ‘लर्निंग-टू-अर्निंग इंडिया’ की ओर:
डॉ. मेहता ने कहा कि नीति आयोग की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि भारत को स्किलिंग को अलग-अलग योजनाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों का समूह मानने के बजाय एक समग्र जीवनभर चलने वाली व्यवस्था के रूप में देखना होगा। नई व्यवस्था के तीन मूल सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं। पहला कि शिक्षा और रोजगार के बीच एक से अधिक, लचीले, सुगम रास्ते हों। दूसरा , स्किलिंग जीवनभर चलने वाली प्रक्रिया हो। और तीसरा कि बीसफलता का पैमाना रोजगार, प्रगति और सम्मानजनक आजीविका हो।
और इसी में उदयपुर जैसे जिलों के लिए एक बड़ा अवसर छिपा है। हर संस्थान में हर सुविधा नहीं, लेकिन हर विद्यार्थी तक हर जरूरी सुविधा हो । हर विद्यार्थी से महंगी फीस नहीं, बल्कि जरूरतमंद विद्यार्थी तक वित्तीय सहायता पहुंचे।हर डिग्री के साथ कौशल और काम का अनुभव हो । हर प्रशिक्षण के बाद केवल प्रमाण-पत्र नहीं, बल्कि रोजगार और आजीविका की दिशा मिलें।
