उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने ज्ञान, सुख, स्वतंत्रता और धार्मिक क्रियाओं के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हमारा ज्ञान इंद्रियों के माध्यम से प्राप्त होता है। इंद्रियां कमजोर हों तो हमारी क्षमताएं भी सीमित हो जाती हैं। शरीर की क्षमता के कारण ही हम संसार में अनेक कार्य कर पाते हैं। हालांकि परमात्मा महावीर को केवल्य ज्ञान प्राप्त होने के बाद इंद्रियों की आवश्यकता नहीं रही।
साध्वी श्रीजी ने कहा कि सुख सभी चाहते हैं, लेकिन सुख की परिभाषा प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग हो सकती है। ज्ञानियों के लिए वास्तविक सुख वह है जो शाश्वत और स्वाधीन हो। जीवन तो मिला है, लेकिन जीवन जीने का समय हमारे हाथ में नहीं है। जहां बंधन नहीं है, वहीं वास्तविक सुख है।
उन्होंने कहा कि आज जीवन अनेक प्रकार के बंधनों से घिर गया है। व्यक्ति पहले माता-पिता की जिम्मेदारियों में और बाद में बच्चों की जिम्मेदारियों में बंधा रहता है। परिवार में रहते हुए हर व्यक्ति को अनेक बातों का ध्यान रखना पड़ता है। ऐसे में परमात्मा की आज्ञा के अनुसार जीवन जीने की इच्छा जागृत होना आत्मिक उन्नति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी ने कहा कि “सोते समय समाधि और उठते ही उपाधि, इसी का नाम संसार है।” इसके बावजूद व्यक्ति संसार छोड़ने की इच्छा नहीं करता। उन्होंने आचारांग सूत्र एवं उसकी टीका का उल्लेख करते हुए कहा कि मंगलाचरण, प्रयोजन और उद्देश्य के साथ क्रिया भी आवश्यक है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल ज्ञान से जीवन में परिवर्तन नहीं आता, ज्ञान के साथ क्रिया जरूरी है। जिस प्रकार पेड़ पर फल नहीं आए तो उसका होना अधूरा लगता है, उसी प्रकार ज्ञान तभी सार्थक है जब वह आचरण में दिखाई दे।
साध्वी श्रीजी ने क्रिया की तुलना रेलिंग से करते हुए कहा कि रेलिंग व्यक्ति को ऊपर चढ़ने में सहारा देती है और नीचे गिरने से भी बचाती है। इसी प्रकार धार्मिक क्रिया व्यक्ति को पापों से बचाने के साथ धर्म के क्षेत्र में आगे बढ़ाती है। उन्होंने कहा कि मन लगे या नहीं, धार्मिक क्रिया करते रहना चाहिए। परमात्मा से जुड़ा व्यक्ति पाप भाव से दूर रहता है।
इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भक्तिमय गीत प्रस्तुत किया।
इंद्रियों से मिलता है ज्ञान, लेकिन क्रिया से सार्थक होता है धर्मःसाध्वी विद्युतप्रभा
