दीक्षा के लिए विद्वत्ता नहीं, पात्रता जरूरी : आचार्य मुक्तिसागर महाराज

उदयपुर व्यूज़ | ताजा खबरें

– आयड़ जैन तीर्थ में चार माह तक अनवरत बहेगी धर्म ज्ञान की गंगा
उदयपुर, 1 अगस्त। तपागच्छ की उद्गम स्थली आयड़ जैन तीर्थ में मालव मार्तंड आचार्य भगवंत मुक्तिसागर सूरीश्वर महाराज एवं अचल मुक्ति सागर सूरीश्वर महाराज सहित ठाणा-4 के सानिध्य में चातुर्मास महोत्सव श्रद्धा और धार्मिक उत्साह के साथ जारी है। चातुर्मास के अंतर्गत आयोजित संनिधाय प्रश्नोत्तरी प्रवचन में आचार्य श्री ने जिज्ञासुओं के अनेक आध्यात्मिक एवं व्यवहारिक प्रश्नों के समाधान प्रस्तुत किए।
महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर ने बताया कि प्रवचन के दौरान एक प्रश्न के उत्तर में आचार्यश्री ने कहा कि दीक्षा के लिए केवल ज्ञान या विद्वत्ता पर्याप्त नहीं होती, बल्कि वैराग्य, पात्रता और योग्यता सबसे अधिक आवश्यक हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि शास्त्रों का अध्ययन महत्वपूर्ण है, लेकिन दीक्षा का वास्तविक आधार आंतरिक पात्रता और संयमपूर्ण जीवन जीने की क्षमता है। उन्होंने यह भी कहा कि कौतुकप्रिय व्यक्ति दीक्षा के योग्य नहीं माना जाता तथा जिनका जंघाबल और दृष्टिबल अत्यधिक क्षीण हो चुका हो, उन्हें भी दीक्षा नहीं दी जाती। प्रवचन के दौरान उपस्थित श्रद्धालुओं ने धर्म से जुड़े अनेक प्रश्न पूछे, जिनका आचार्यश्री ने शास्त्रसम्मत एवं सरल भाषा में समाधान किया।
संघ के कार्याध्यक्ष भोपालसिंह एवं सचिव कुलदीप नाहर ने बताया कि इस जिज्ञासा-शांति प्रवचन में पूछे गए प्रश्नों में श्रीमती निरूपा जैन का प्रश्न सर्वश्रेष्ठ चुना गया, जिन्हें सम्मानित किया गया। निरूपा जैन ने पूछा कि अष्टमी और चतुर्दशी के दिन जब स्वयं फल ग्रहण नहीं किए जाते, तो मंदिर में भगवान को फल क्यों अर्पित किए जाते हैं? इस पर आचार्यश्री ने उत्तर दिया कि भगवान के समक्ष कभी भी अभक्ष्य वस्तुएं अर्पित नहीं की जातीं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि आद्रा नक्षत्र के बाद आम (केरी) अभक्ष्य माना जाता है, इसलिए उसे नहीं चढ़ाया जाता। इसी प्रकार सीताफल तुच्छ फल होने के कारण मंदिर में अर्पित नहीं किया जाता। किंतु अष्टमी और चतुर्दशी के दिन फल अभक्ष्य नहीं होते, बल्कि पर्व तिथि होने तथा उस दिन आयुष्य कर्म के बंध की संभावना अधिक होने के कारण श्रद्धालु स्वयं उनका त्याग करते हैं। इसलिए उस दिन भगवान को फल अर्पित करने में कोई दोष नहीं माना जाता।
चातुर्मास के अंतर्गत शनिवार को दोपहर 3.30 से 4.30 बजे तक तरुण संस्कार शिविर आयोजित किया गया। वहीं रविवार प्रात: 9.30 से दोपहर 12 बजे तक भक्तियोग शिविर का आयोजन होगा, जिसके पश्चात साधर्मिक भक्ति का कार्यक्रम भी रखा गया है। चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन धार्मिक प्रवचन, संस्कार शिविर एवं विविध आध्यात्मिक कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु सहभागिता कर रहे हैं।

By Udaipurviews

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