धर्मनगरी उदयपुर में भक्ति का महासागर,95 किलो चांदी के रथ पर निकले भगवान जगन्नाथ

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21 बंदूकों की सलामी, 375 साल पुराने रथ ने बढ़ाई ऐतिहासिक गरिमा; जगदीश चौक की छतों पर उमड़ा जनसैलाब
उदयपुर, 16 जुलाई: आषाढ़ शुक्ल द्वितीया पर धर्मनगरी उदयपुर गुरुवार को भगवान जगन्नाथ के जयघोष से गूंज उठी। देश की तीसरी सबसे बड़ी और राजस्थान की सबसे बड़ी जगन्नाथ रथयात्रा में हजारों श्रद्धालुओं की आस्था उमड़ पड़ी। जगदीश चौक से भगवान जगन्नाथ 95 किलो वजनी रजत रथ पर माता लक्ष्मी और दानीराय जी के साथ नगर भ्रमण के लिए रवाना हुए। रथयात्रा शुरू होते ही भगवान को 21 बंदूकों की सलामी दी गई, जबकि चारों ओर “जय जगन्नाथ” के उद्घोष से पूरा पुराना शहर भक्तिमय हो गया।


इस वर्ष रथयात्रा कई मायनों में ऐतिहासिक रही। मंदिर स्थापना के बाद पहली बार 375 वर्ष पुराने पारंपरिक लकड़ी के रथ को भी यात्रा में शामिल किया गया, जिसमें भगवान जुगल जोड़ी सरकार विराजमान हुए। वहीं करीब 70 वर्ष बाद मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार की ओर से भगवान को विशेष शाही पोशाक अर्पित की गई। सिटी पैलेस से पारंपरिक शाही ठाट-बाठ के साथ पोशाक मंदिर पहुंचाई गई, जबकि पूर्व राजपरिवार के सदस्य लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने छेरा पहरा (बुहारने) की परंपरा निभाकर महाआरती की।
रथयात्रा जगदीश चौक से घंटाघर, भड़भूजा घाटी, भोपालवाड़ी, मंडी की नाल, अस्थल चौराहा और आरएमवी स्कूल तक पहुंची, जहां भगवान की आरती के बाद देर रात पुनः जगदीश मंदिर लौटने का कार्यक्रम तय है। पूरे मार्ग पर सामाजिक संगठनों ने पानी, छाछ, शरबत और जलपान की व्यवस्था कर श्रद्धालुओं का स्वागत किया। जगदीश चौक और पुराने शहर की गलियां श्रद्धालुओं से खचाखच भरी रहीं, जबकि घरों और होटलों की छतों पर हजारों लोग रथयात्रा के दिव्य दर्शन करते नजर आए।
रथयात्रा की 5 प्रमुख खासियतें
देश की तीसरी और राजस्थान की सबसे बड़ी जगन्नाथ रथयात्रा।
375 साल पुराने ऐतिहासिक लकड़ी के रथ का पहली बार शामिल होना।
70 वर्ष बाद मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार ने भगवान को शाही पोशाक अर्पित की।
रथयात्रा शुरू होते ही भगवान जगन्नाथ को 21 बंदूकों की सलामी दी गई।
पूरे मार्ग पर सेवा शिविर, जलपान और हजारों श्रद्धालुओं की ऐतिहासिक भागीदारी।

By Udaipurviews

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