उदयपुर में एआई और पर्यावरणीय निगरानी पर राष्ट्रीय सेमीनार सम्पन्न

उदयपुर में एआई और पर्यावरणीय निगरानी विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सेमीनार

विद्यापीठ विज्ञान संकाय – ‘वायुमंडलीय भौतिकी एवं पर्यावरणीय निगरानी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ विषय पर आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमीनार का हुआ समापन
एआई मानव संवेदनाओं का विकल्प नहीं, सोचने की क्षमता को कर रहा प्रभावित – प्रो. सारंगदेवोत
उत्कृष्ट प्रतिभागियों का किया सम्मान

उदयपुर 24 मई / राजस्थान विद्यापीठ के संघटक विज्ञान संकाय के फिजिक्स विभाग की ओर से प्रतापनगर स्थित कुलपति सचिवालय सभागार में ‘वायुमंडलीय भौतिकी एवं पर्यावरणीय निगरानी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ विषय पर राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन किया गया। सेमीनार में वक्ताओं ने पर्यावरण संरक्षण, मौसम विज्ञान, भारतीय ज्ञान परम्परा तथा आधुनिक तकनीक के प्रभाव जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार व्यक्त किए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत ने कहा कि आधुनिक युग में तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का तेजी से विस्तार हो रहा है, लेकिन कोई भी तकनीक मानवीय संवेदनाओं का स्थान नहीं ले सकती। उन्होंने कहा कि आज का युवा अपने स्वयं के ज्ञान और चिंतन से अधिक एआई पर विश्वास करने लगा है, जिससे उसकी सोचने और विश्लेषण करने की क्षमता प्रभावित हो रही है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे तकनीक का उपयोग केवल साधन के रूप में करें, न कि अपनी बौद्धिक क्षमता के विकल्प के रूप में।

उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा में प्रकृति, पर्यावरण और मानव जीवन के बीच संतुलन बनाए रखने की शिक्षा दी गई है। वर्तमान समय में पर्यावरणीय संकटों से निपटने के लिए वैज्ञानिक      दृष्टिकोण के साथ-साथ पारंपरिक ज्ञान को भी अपनाने की आवश्यकता है।

मुख्य अतिथि कुलाधिपति भंवर लाल गुर्जर ने कहा कि वैश्विक स्तर पर हो रहे युद्धों और औद्योगिक गतिविधियों के कारण तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है, जिसका असर पूरी दुनिया के पर्यावरण पर दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति और ज्ञान परम्परा अत्यंत वैज्ञानिक रही है। हमारे तीज-त्योहार, रीति-रिवाज और धार्मिक परम्पराएं भी विज्ञान से जुड़ी हुई हैं।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय घरों में तुलसी का पौधा लगाने और पीपल की पूजा करने की परम्परा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देती है। हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के महत्व को समझते हुए उसे संस्कृति से जोड़ा ताकि समाज पर्यावरण के प्रति जागरूक बना रहे।
प्रांरभ में निदेशक डाॅ. सपना श्रीमाली ने अतिथियों का स्वागत करते हुए बताया कि तकनीकी सत्रों में मुख्य वक्ता डॉ. पृथ्वी सिंह, प्रो. मुकेश श्रीमाली तथा प्रो. विमल सारस्वत, डॉ. नीरू तलेसरा एवं  डॉ. सांत्वना बापना  ने वातावरणीय भौतिकी, मौसम पूर्वानुमान और पर्यावरणीय निगरानी के विभिन्न आयामों पर विस्तार से जानकारी दी। वक्ताओं ने कहा कि भारत प्राचीन काल से कृषि प्रधान देश रहा है और उस समय लोग बादलों की दिशा, हवाओं के रुख तथा प्राकृतिक संकेतों के आधार पर मौसम का अनुमान लगा लेते थे।

उन्होंने कहा कि वर्तमान में आधुनिक सेटेलाइट तकनीक और वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से मौसम का सटीक पूर्वानुमान लगाया जा रहा है, जिससे तूफान, चक्रवात और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की पूर्व चेतावनी देकर जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकता है।
सेमीनार में पोस्टर एवं शोध पत्र प्रस्तुति प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसमें प्रत्यक्षा गुप्ता प्रथम, निकिता सोलंकी द्वितिय, मंजीत सिंह तृतीय,  ने तकनीकी सत्र में श्याम सिंह राठौर प्रथम, बुलबुल द्वितीय, विष्णु सेन तृतीय स्थान पर रहे। विजेता का अतिथियों द्वारा स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

संयोजक डाॅ. योगिता श्रीमाली ने प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सिद्धिमा शर्मा ने किया, जबकि आभार डॉ. लोकेश सुथार ने व्यक्त किया

इस अवसर पर विज्ञान संकाय से डॉ. जयसिंह जोधा, डॉ. उत्तम प्रकाश शर्मा, डॉ. मंगल सिंह दुलावत, डॉ. भावेश जोशी, डॉ. लोकेश सुथार, डॉ. खुशबू जैन, डॉ. पूजा जोशी, सिद्धिमा शर्मा, डॉ. शक्तिका चैधरी, डॉ. ललिमा शर्मा, डॉ. हिमानी वर्मा सहित विभागाध्यक्ष, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

By Udaipurviews

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