साध्वियों के सानिध्य में अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की
– आयड़ जैन तीर्थ में अनवरत बह रही धर्म ज्ञान की गंगा
उदयपुर 7 नवम्बर। श्री जैन श्वेताम्बर महासभा के तत्वावधान में तपागच्छ की उद्गम स्थली आयड़ तीर्थ पर बरखेड़ा तीर्थ द्वारिका शासन दीपिका महत्ता गुरू माता सुमंगलाश्री की शिष्या साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री एवं वैराग्य पूर्णाश्री आदि साध्वियों के सानिध्य में मंगलवार को विशेष पूजा-अर्चना के साथ विविधि अनुष्ठान हुए। महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर ने बताया कि आयड़ तीर्थ के आत्म वल्लभ सभागार में परमार क्षत्रियोद्धारक कलिकाल चिंतामणि गुरु देव श्रीमद् विजय इन्द्रदिन्न सुरीश्वर का जन्म दिवस बड़े धूमधाम से तथा ठाट पाट से मनाया गया। तप-जप, अनुष्ठान, भजन, उनके जीवन पर प्रकाश डालते हुए जन्मदिन मनाया गया। सुबह 7 बजे दोनों साध्वियों के सानिध्य में आरती, मंगल दीपक, सुबह सर्व औषधी से महाअभिषेक एवं अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की गई। जैन श्वेताम्बर महासभा के अध्यक्ष तेजसिंह बोल्या ने बताया कि प्रवचनों की श्रृंखला में प्रात: 9.15 बजे साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री व वैराग्यपूर्णा ने प्रतिदिन के परमात्मा पूजा – भक्ति-विधि के प्रवचन में उन्होंने बताया कि अष्ट प्रकारी जिन पूजा पूर्ण करने के बाद भान पूजा (चैत्यवंदन) गुरु करने से पूर्व इस अवस्था त्रिक का चिंतन करना चाहिए। परमात्मा की विभिन्न अवस्थाओं को याद करने के लिये परिकर में रहे हुए विविध चिह्नों का आलंबन किया जाता है। पिण्डस्थ अवस्था के तीन भेद-जन्म- राज्य-और श्रमण प्रथम जन्म अवस्था की भावना- देवाधिदेव की प्रतिमा के ऊपर विद्यमान परिकर में हाथी पर बैठे देवों को, हाथी की सूंड पर विद्यमान कलशों को देखकर परमात्मा की जन्म अवस्था का विचार करना चाहिए! हे परमात्मा ! तीन ज्ञान सहित आप जब माता के गर्भ में पधारते हो, तब क्षणभर के लिये विश्व के समस्त जीवों को सुख की अनुभूति होती है। आपकी मात्रा को चौदह अनुपम महास्वप्नों के दर्शन होते हैं। देवराज इन्द्र का अचल सिंहासन भी कंपित हो उठता है। इन्द्रमहाराज अपनी रत्न जडि़त जूती उतार कर सात कदम आगे चलकर शक्रस्तव(नमुत्युर्ण सूत्र) से आपकी स्तुति करते हैं। निर्यत्जृम्भक देवता विभिन्न स्थलों पर छिपे प्राचीन भंडारों से राज भंडार को छलका देते हैं। आपके गर्भ काल में गर्भ में रहते हुए भी आप विश्व स्थितिका अवलोकन करके तटस्थ भाव धारण किए रहते है। आपके जन्म समय में महासूर्य के प्रकाश की भांति सर्वत्र सुख का प्रकाश प्रसारित हो जाता है। छप्पन दिग कुमारिकाएं जन्मोत्सव करने के लिए हर्पसहित दौड आती है। इन्द्रमहाराज अपने परिवार के साथ मेरू पर्वत पर जन्मोत्सव मनाते है। चातुर्मास संयोजक अशोक जैन ने बताया कि आयड़ जैन तीर्थ पर प्रतिदिन सुबह 9.15 बजे से चातुर्मासिक प्रवचनों की श्रृंखला में धर्म ज्ञान गंगा अनवरत बह रही है।
परमात्मा का जन्म अवस्था का चिन्तन करें : साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री
