उदयपुर। आज प्रो गौरव वल्लभ ने अनगढ़ बावजी , सांवलिया (चितौड़) में चल रहे चातुर्मास में श्री अवधेशानंद महाराज के दर्शन कर, मेवाड की प्रसिद्ध कावड़ कला के प्रोत्साहन के लिए आशीर्वाद प्राप्त किया.।
कावड़ यानी लकड़ी की डिब्बे जैसी कलाकृति, जिसके परत दर परत पट खुलते जाते हैं और साथ ही खुलती जाती है एक चित्रकथा। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ का बस्सी गाँव इस अद्भुत काष्ठ कला के लिए जाना जाता है वहीं उदयपुर में भी कुछ कलाकार इस ऐतिहासिक कला को जीवित रखे हुए हैं। पारंपरिक रूप से कावड़ की दीवारों पर रामायण, महाभारत जैसी धार्मिक एवं ऐतिहासिक कथाओं का लोक चित्रण होता आया है, पर बदलते समय में कलाकार नए-नए विषयों पर भी काम कर रहे हैं। आम प्रचलित कावड़ 12 इंच की और लाल रंग की होती है पर अब अन्य रंगों का प्रयोग भी होने लगा है। दो कपाट से शुरू हुई कावड़ परंपरा में अब 16 कपाट तक की कावड़ बनती है. कलाकार चित्रण के लिए रंग भी खुद ही बनाते हैं.
उदयपुर के मांगीलाल मिस्त्री की बनाई हुई रामायण और कृष्ण लीला की कावड़ गुरुदेव को भेट की। धार्मिक और पौराणिक कथाएं कावड़ के सबसे प्रचलित विषय हैं, पर अब कलाकार जागरूकता संदेश के लिए भी इस कला का प्रयोग कर रहे है। कावड़ की चित्रकारी इतनी सशक्त होती है कि जैसे जैसे एक-एक पट खुलता जाता है, दर्शकों के सामने कथा साकार होती जाती है.
राजस्थान के कावड़ कलाकारों को बहुत से पुरस्कार और सम्मान भी मिल चुके हैं. लेकिन अब समय के साथ अनदेखी और कम आमदनी के चलते ये कला और कलाकार लुप्त हो रहे है।
प्रो गौरव वल्लभ ने अवधेशानंद महाराज के दर्शन कर मेवाड की कावड़ कला के प्रोत्साहन के लिए आशीर्वाद लिया
