तीन पदमश्री विभूतियों सहित नमामि गंगे के निदेशक ने किया विश्वजल सम्मेलन में मंथन
उदयपुर। भारतीय आस्थाओं तथा ज्ञान परंपराओं और जीवन पद्वतियों की ही महानता है कि प्रकृति का संरक्षण और संवर्धन इसमें रचा बसा है,लेकिन आधुनिकता और विकास की हवा ने परम्परागत ज्ञान और विद्या के साथ हमारी पवित्र नदियां और सरोवरों ने अपना स्वरूप ही खो दिया। पर्यावरणीय क्षति और इसके दुष्प्रभावों का असर सिंचाई तंत्र और फसलों पर भी दिखाई दिया है। वर्तमान में ये हालात हो गए है कि कई स्थानों पर तो फसलें ही जल संकट का सबब बन गई है।
ये विचार कार्यक्रम के मुख्यवक्ता नमामि गंगे के निदेशक अशोक कमार ने मंगलवार को जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय एवं विश्व जन आयोग स्वीडन के साझे में आयोजित दूसरे विश्व जल सम्मेलन के तकनीकी सत्र मुख्य वक्ता और नमामी गंगे के प्रबंध निदेशक अशोक कुमार ने ’’डीफेन्डींग द सेकरेड फोर ससटेनेबल डवलपमेंट आॅफ नेचर एंड हयूमनकाइन्ड’’ विषयक पर कही।
उन्होंने कहा, परम्परागत ज्ञान के छूट जाने और अधिक मुनाफा कमाने के भाव में मिटटी की प्रकृति के प्रतिरूप और सिंचाई में आवश्यकता से अधिक पानी का उपयोग होने लगा है। फसलों के लिए सतही जल के साथ भूगर्भीय जल का अंधाधंुद दोहन भी हो रहा है। इससे बचाव के लिए स्थानीय संसाधनों के परंपरागत ज्ञान को आम जनमानस के साथ जोड़ा जाना चाहिए। सही फसल योजना इस दिशा में कार्य कर रही है।
प्रकृति का संयमित-संतुलित उपयोग ही उसके संवर्धन का आधार-प्रो सारंगदेवोत
तकनीकी सत्र के अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. एसएस. सारंदेवोत ने प्रकृति और मानव जीवन के आपसी संबधों के प्रभावों पर विचार रखते हुए दोनों में परस्पर निर्भरता के साथ सकारात्मक और सौहार्दपूर्ण संबंधों की आवश्यकता की बात कही। प्रो.सारंगदेवोत ने प्रकृति के संयमित और संतुलित उपयोग के द्वारा मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए पर्यावरणीय संवर्धन की संकल्पना को आत्मसात करने पर जोर दिया। भविष्य में बेहतर पर्यावरण और पर्याप्त प्राकृतिक संसाधनांे की उपलब्धता बनाए रखने के लिए युवा पीढ़ी से इस सोच को अपनाने का आव्हान किया।
पानीदार जमीन के लिए नदियों के पारिस्थितिकी प्रवाह को बनाए रखना जरूरी-डाॅ राजेन्द्र सिंह
पानी बाबा डाॅ राजेन्द्र सिंह ने कहा कि मैदानों से लेकर पहाड़ों तक पानी को संजोने और सहेजने का कार्य हो रहा है। उन्हांेने भारत सरकार से गंगा पर कोई बांध नहीं बनाने,उसके पारिस्थितिकी प्रवाह को बनाए रखने के साथ गंगा उद्वार के लिए निस्वार्थ कार्य करने वालों को इन प्रयासों को शामिल करने की मांग की। उन्होने भूमि को पानीदार बनाए रखने के लिए नदियों के प्रवाहों को संतुलित बनाए जाने की भी बात कही। अन्य 4 तकनीकी सत्रों में तीन पदमश्री विभूतियों क्रमशः उमाशंकर पांडे, लक्ष्मण सिंह और यूनेस्को के पूर्व निदेशक रामभुज ने भी संबोधित किया तथा जल जीवन और उसके संर्वधन के लिए अपने अपने क्षेत्रों में किए कार्यों को बताते तथा पर्यावरण तथा इससे जुड़े मुददों और सतत विकास के बारे में विचार वयक्त किए।
अंतरराष्ट्रीय काॅफ्रेंस में अमरीका, नोर्थ अमेरिका,एशिया,यूरोप,अफ्रीका,स् वीडन, कनाड़ा, इजिप्ट, पुतर्गाल, लिथूनिया, आस्ट्रेलिया, नेपाल सहित भारत के महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, लद्वाक, दिल्ली, तमिलनाडु, कर्नाटक, राजस्थान के विभिन्न राज्यों से सौ से अधिक प्रतिभागी भाग ले रहे हैं। तीन दिवसीय विश्व जलसम्मेलन का समापन समारोह बुधवार को डबोक स्थित काॅलेज आॅफ एग्रीकल्चर साइंसेज सभागार में 11 बजे आयोजित किया जाएगा।
ये विचार कार्यक्रम के मुख्यवक्ता नमामि गंगे के निदेशक अशोक कमार ने मंगलवार को जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय एवं विश्व जन आयोग स्वीडन के साझे में आयोजित दूसरे विश्व जल सम्मेलन के तकनीकी सत्र मुख्य वक्ता और नमामी गंगे के प्रबंध निदेशक अशोक कुमार ने ’’डीफेन्डींग द सेकरेड फोर ससटेनेबल डवलपमेंट आॅफ नेचर एंड हयूमनकाइन्ड’’ विषयक पर कही।
उन्होंने कहा, परम्परागत ज्ञान के छूट जाने और अधिक मुनाफा कमाने के भाव में मिटटी की प्रकृति के प्रतिरूप और सिंचाई में आवश्यकता से अधिक पानी का उपयोग होने लगा है। फसलों के लिए सतही जल के साथ भूगर्भीय जल का अंधाधंुद दोहन भी हो रहा है। इससे बचाव के लिए स्थानीय संसाधनों के परंपरागत ज्ञान को आम जनमानस के साथ जोड़ा जाना चाहिए। सही फसल योजना इस दिशा में कार्य कर रही है।
प्रकृति का संयमित-संतुलित उपयोग ही उसके संवर्धन का आधार-प्रो सारंगदेवोत
तकनीकी सत्र के अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. एसएस. सारंदेवोत ने प्रकृति और मानव जीवन के आपसी संबधों के प्रभावों पर विचार रखते हुए दोनों में परस्पर निर्भरता के साथ सकारात्मक और सौहार्दपूर्ण संबंधों की आवश्यकता की बात कही। प्रो.सारंगदेवोत ने प्रकृति के संयमित और संतुलित उपयोग के द्वारा मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए पर्यावरणीय संवर्धन की संकल्पना को आत्मसात करने पर जोर दिया। भविष्य में बेहतर पर्यावरण और पर्याप्त प्राकृतिक संसाधनांे की उपलब्धता बनाए रखने के लिए युवा पीढ़ी से इस सोच को अपनाने का आव्हान किया।
पानीदार जमीन के लिए नदियों के पारिस्थितिकी प्रवाह को बनाए रखना जरूरी-डाॅ राजेन्द्र सिंह
पानी बाबा डाॅ राजेन्द्र सिंह ने कहा कि मैदानों से लेकर पहाड़ों तक पानी को संजोने और सहेजने का कार्य हो रहा है। उन्हांेने भारत सरकार से गंगा पर कोई बांध नहीं बनाने,उसके पारिस्थितिकी प्रवाह को बनाए रखने के साथ गंगा उद्वार के लिए निस्वार्थ कार्य करने वालों को इन प्रयासों को शामिल करने की मांग की। उन्होने भूमि को पानीदार बनाए रखने के लिए नदियों के प्रवाहों को संतुलित बनाए जाने की भी बात कही। अन्य 4 तकनीकी सत्रों में तीन पदमश्री विभूतियों क्रमशः उमाशंकर पांडे, लक्ष्मण सिंह और यूनेस्को के पूर्व निदेशक रामभुज ने भी संबोधित किया तथा जल जीवन और उसके संर्वधन के लिए अपने अपने क्षेत्रों में किए कार्यों को बताते तथा पर्यावरण तथा इससे जुड़े मुददों और सतत विकास के बारे में विचार वयक्त किए।
अंतरराष्ट्रीय काॅफ्रेंस में अमरीका, नोर्थ अमेरिका,एशिया,यूरोप,अफ्रीका,स्
