’देवेंद्र धाम में आज से हुआ महाप्रभु महावीर की अंतिम वाणी उत्तराध्ययन सूत्र का शुभारंभ
उदयपुर, 4 नवम्बर। देवेन्द्रधाम स्थित महावीर समवशरण में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए डॉ. सुरेन्द्र मुनि ने कहा कि महावीर स्तुति हमें अपने भीतर के दोषों को देखने और सुधारने की सीख देती है। सामान्यतः मानव मन हमेशा दूसरों की कमियों पर ध्यान केंद्रित करता है। यदि हम एक अंगुली किसी दूसरे की तरफ उठाते हैं, तो तीन अंगुलियां स्वतः हमारी अपनी ओर उठती हैं।
उन्होंने कहा कि दूरबीन दूसरों को दिखाती है, जबकि कांच (आईना) स्वयं का अक्स दिखाता है। हमें कांच की भांति अपने स्वयं के दोषों पर दृष्टि रखनी चाहिए। व्यक्ति अक्सर अपनी आदतों से मजबूर हो जाता है, किंतु जो अपनी आदतों को सुधार लेता है, वही सच्चा ज्ञानी कहलाता है। आदतें मकान की सीढ़ियों के समान हैं, जो व्यक्ति को ऊंचाई पर भी ले जाती हैं और नीचे भी उतार सकती हैं। हमें अपने जीवन रूपी भवन का निर्माण करना चाहिए, न कि बुलडोजर बनकर किसी के जीवन को गिराने का काम करना चाहिए।
सभा में प्रवर्तक डॉ. राजेन्द्र मुनि ने भगवान महावीर की अंतिम वाणी उत्तराध्ययन सूत्र 1 से 7 अध्ययनों का वांचन करते हुए जीवन में विनयशीलता लाने और आने वाले कष्टों को समभाव से सहन करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ और बहुमूल्य है, इसे व्यर्थ गंवाने के बजाय सार्थक बनाना चाहिए। ज्ञानी जन अंतिम समय में संथारा ग्रहण कर मरण को भी महोत्सव बना देते हैं। उन्होंने पाप प्रवृत्तियों से यथासंभव बचने की सीख दी।
कार्यक्रम में उपाध्याय रमेश मुनि एवं दीपेश मुनि द्वारा मंगल गान प्रस्तुत किया गया। श्राविका संघ द्वारा सभी गुरु भक्तों को जय जिनेन्द्र कर प्रसाद-प्रभावना वितरित की गई। अंत में महामंत्री हिम्मत बडाला ने सभी का आभार ज्ञापित किया।
