राजनीति में मर्यादा के पर्याय : भैरोंसिंह शेखावत

उदयपुर व्यूज़ | ताजा खबरें
जिन्होंने अंत्योदय को राजधर्म और जनसेवा को जीवनधर्म माना
भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान केवल उनके द्वारा धारण किए गए पदों से नहीं, बल्कि उन मूल्यों से होती है, जिन्हें वे अपने आचरण से प्रतिष्ठित करते हैं। जिनकी राजनीतिक सफलता का मूल्यांकन सत्ता में बिताए वर्षों से नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में आए परिवर्तन से किया जाता है। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत ऐसा ही एक व्यक्तित्व थे।
भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक परंपरा के प्रखर प्रतिनिधि भैरोंसिंह शेखावत ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘अंत्योदय’ दर्शन को शासन और प्रशासन की कार्यसंस्कृति में उतारने का उल्लेखनीय प्रयास किया। उनके लिए अंत्योदय कोई राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि विकास की कसौटी था। वे मानते थे कि शासन की सार्थकता तब है, जब उसकी योजनाओं का लाभ उस व्यक्ति तक पहुँचे, जो समाज की अंतिम पंक्ति में खड़ा है और जिसकी आवाज सत्ता के गलियारों तक सबसे कम पहुँचती है।
खाचरियावास के एक साधारण कृषक परिवार से निकलकर राजस्थान के मुख्यमंत्री और देश के उपराष्ट्रपति पद तक पहुँचे शेखावत ने अपने संघर्ष, राजनीतिक कौशल, प्रशासनिक सूझबूझ और सहज मानवीय व्यवहार से भारतीय लोकतंत्र में विशिष्ट स्थान बनाया। उन्हें ‘अजातशत्रु’ कहा गया, क्योंकि उन्होंने राजनीतिक विरोध को व्यक्तिगत शत्रुता में बदलने से सदैव परहेज किया।
उनकी राजनीति का मूल स्वर मानो यही था— विचारों में दृढ़ता हो, निर्णयों में निष्पक्षता हो और व्यवहार में ऐसी उदारता हो, जो विरोधी के मन में भी सम्मान उत्पन्न करे।
संघर्ष से शिखर तक : एक असाधारण जीवनयात्रा-23 अक्टूबर 1923 को सीकर जिले के खाचरियावास गाँव में पिता देवीसिंह शेखावत और माता बानेकंवर के घर जन्मे भैरोंसिंह का बचपन सामान्य ग्रामीण परिवेश में बीता। पिता का साया अल्पायु में ही उठ गया। परिवार की जिम्मेदारियों ने उन्हें कम उम्र में ही जीवन की कठोर वास्तविकताओं से परिचित करा दिया। शिक्षा की आकांक्षाओं के साथ उन्हें कृषि और आजीविका के संघर्ष में भी उतरना पड़ा।
उन्होंने पुलिस सेवा में भी कार्य किया, किंतु उनकी प्रवृत्ति केवल नौकरी तक सीमित रहने वाली नहीं थी। स्वतंत्रता के बाद देश और समाज के पुनर्निर्माण की आकांक्षा ने उन्हें सार्वजनिक जीवन की ओर प्रेरित किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ की वैचारिक परंपरा से जुड़कर उन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में कदम रखा।
उनकी यात्रा किसी राजनीतिक परिवार की विरासत, आर्थिक संपन्नता अथवा सत्ता के संरक्षण से निर्मित नहीं हुई। यह संघर्ष, जनसंपर्क, संगठननिष्ठा और लोकतंत्र में गहरी आस्था की यात्रा थी।
यही कारण है कि उनका जीवन राजस्थान के उन असंख्य सामान्य कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा बना, जो सीमित साधनों के बावजूद सार्वजनिक जीवन में बड़ा योगदान देने का स्वप्न देखते हैं।
दस रुपये से आरंभ हुआ लोकतांत्रिक सफर-1952 में राजस्थान विधानसभा के प्रथम आम चुनाव में वे दातारामगढ़ क्षेत्र से भारतीय जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में निर्वाचित हुए। यही उनके दीर्घ संसदीय जीवन का आरंभ था। आगे चलकर वे राजस्थान विधानसभा के ग्यारह में से दस सदनों के सदस्य रहे और लगभग पाँच दशकों तक प्रदेश की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते रहे।
उनके प्रथम चुनाव से जुड़ा दस रुपये का प्रसंग विशेष रूप से प्रेरक है। चुनाव लड़ने के लिए पर्याप्त धनराशि तक उपलब्ध नहीं थी। ऐसे समय में वे अपनी धर्मपत्नी श्रीमती सूरजकंवर से दस रुपये लेकर चुनाव मैदान में उतरे। बाद में जब वे राजनीति के शिखर पर पहुँचे, तब भी इस प्रसंग को सहज मुस्कान के साथ सुनाते थे। उनकी धर्मपत्नी भी परिहासपूर्वक उन दस रुपयों की याद दिलाना नहीं भूलती थीं।
कल्पना कीजिए—जिस व्यक्ति के सामने चुनाव लड़ने के लिए दस रुपये जुटाना चुनौती था, वही आगे चलकर राजस्थान की राजनीति का सबसे प्रभावशाली जननेता बना और देश के उपराष्ट्रपति पद तक पहुँचा।
यह प्रसंग केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस शक्ति का प्रमाण है, जो सामान्य पृष्ठभूमि से आए व्यक्ति को भी अपनी प्रतिभा, परिश्रम और जनविश्वास के बल पर सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक पहुँचने का अवसर देती है।
सिद्धांतों के प्रति निष्ठा : समाज से ऊपर जनहित-भैरोंसिंह शेखावत के व्यक्तित्व की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक थी—सिद्धांतों के प्रति उनकी अडिग निष्ठा। वे जानते थे कि सार्वजनिक जीवन में कई बार सही निर्णय लोकप्रिय निर्णय नहीं होता। फिर भी वे केवल तात्कालिक लाभ अथवा सामाजिक दबाव के आधार पर अपना दृष्टिकोण बदलने के पक्षधर नहीं थे।
भूमि सुधार और जागीरदारी उन्मूलन के प्रश्न पर उनका रुख इसी प्रवृत्ति को प्रकट करता है। किसान परिवार में जन्म लेने और स्वयं कृषि जीवन की कठिनाइयों को अनुभव करने के कारण वे भूमि पर वास्तविक खेती करने वाले किसान के अधिकार के प्रति संवेदनशील थे। भूमि सुधार के समर्थन में उनकी भूमिका ने यह स्पष्ट किया कि उनके लिए सामाजिक न्याय और किसान हित केवल भाषण के विषय नहीं थे।
इसी प्रकार 1987 के दिवराला सती प्रकरण में उन्होंने सामाजिक दबावों के बावजूद सती प्रथा के महिमामंडन का विरोध किया। इस प्रश्न पर उनका दृष्टिकोण सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध कानून, विवेक और मानवीय गरिमा के पक्ष में था।
इन प्रसंगों से यह सीख मिलती है कि नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा तब होती है, जब उसे लोकप्रियता और सिद्धांत, सामाजिक दबाव और सार्वजनिक दायित्व के बीच चुनाव करना पड़े। शेखावत ने अपने राजनीतिक जीवन में कई बार इस कठिन परीक्षा का सामना किया।
जनसंघ का संघर्ष और संगठन के प्रति समर्पण-आज राजनीति में संसाधनों, प्रचार माध्यमों और चुनावी प्रबंधन की चर्चा अधिक होती है, किंतु जनसंघ के प्रारंभिक दौर की राजनीति संघर्ष, सीमित साधनों और कार्यकर्ताओं के व्यक्तिगत समर्पण पर आधारित थी।
भैरोंसिंह शेखावत ने उस कठिन दौर को निकट से जिया। विधायक, प्रदेशाध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष जैसे दायित्वों के निर्वहन के बावजूद उनका जीवन सादगी और संघर्ष से जुड़ा रहा।
जनसंघ के दिनों का एक प्रसंग इस जीवनशैली का सजीव चित्र प्रस्तुत करता है। बांसवाड़ा से उदयपुर लौटते समय जयसमंद के निकट बस खराब हो गई। आगे जाने का कोई साधन उपलब्ध नहीं था। ऐसे में उन्होंने अपने साथी नेता भानुकुमार शास्त्री के साथ जयसमंद की पाल पर ही रात बिताई।
आज के साधन-संपन्न राजनीतिक परिवेश में इस प्रसंग की कल्पना करना भी कठिन लगता है। किंतु उस पीढ़ी के अनेक नेताओं के लिए संगठन का काम किसी सुविधा की प्रतीक्षा नहीं करता था। यात्रा का साधन हो या न हो, रात्रि विश्राम की व्यवस्था हो या न हो, सार्वजनिक दायित्व पूरा करना ही प्राथमिकता थी।
यह प्रसंग बताता है कि शेखावत का नेतृत्व केवल विधानसभा के भाषणों और सत्ता के निर्णयों से नहीं बना था; उसकी नींव उन यात्राओं, कठिनाइयों और अनुभवों में भी थी, जिन्होंने उन्हें सामान्य जनजीवन की वास्तविकताओं से जोड़े रखा।
मुख्यमंत्री के रूप में अंत्योदय का प्रयोग-आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के संघर्ष में भैरोंसिंह शेखावत को लगभग उन्नीस महीने जेल में रहना पड़ा। आपातकाल की समाप्ति के बाद 1977 में वे राजस्थान के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने।
इसके बाद उन्होंने 1990–1992 और 1993–1998 में भी मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश का नेतृत्व किया। तीन बार मुख्यमंत्री बनने के साथ-साथ उन्होंने लंबे समय तक नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाई। सत्ता और विपक्ष—दोनों पक्षों में उनका अनुभव उन्हें राजस्थान की राजनीति का विशिष्ट संसदीय व्यक्तित्व बनाता है।
मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पहचान केवल राजनीतिक स्थिरता अथवा प्रशासनिक दक्षता तक सीमित नहीं रही। उन्होंने गरीबी उन्मूलन और ग्रामीण विकास को केंद्र में रखकर कई महत्त्वपूर्ण पहल कीं।
अंत्योदय योजना के माध्यम से समाज के अत्यंत निर्धन परिवारों तक विकास का लाभ पहुँचाने का प्रयास किया गया। ‘काम के बदले अनाज’ कार्यक्रम ने ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका और श्रम के बीच संबंध को मजबूत करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘अपना गाँव, अपना काम’ जैसी पहल ने भी ग्रामीण विकास में स्थानीय सहभागिता की अवधारणा को आगे बढ़ाया।
इन योजनाओं का महत्त्व इस बात में था कि उन्होंने गरीबी को केवल आँकड़ों की समस्या नहीं माना, बल्कि उसे परिवार, सम्मान, आजीविका और सामाजिक अवसरों से जुड़ा प्रश्न समझा।
दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय दर्शन की मूल भावना भी यही थी कि विकास की योजनाओं का मूल्यांकन सबसे कमजोर व्यक्ति की स्थिति में आए परिवर्तन से किया जाए। शेखावत ने इस विचार को प्रशासनिक कार्यक्रमों और नीतिगत प्राथमिकताओं से जोड़ने का प्रयास किया।
उनके शासनकाल में ग्रामीण पर्यटन, विरासत संपदाओं के संरक्षण और उन्हें पर्यटन से जोड़ने की दिशा में भी पहल हुई। इन प्रयासों ने यह संभावना सामने रखी कि राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत और ग्रामीण जीवन भी आजीविका के साधन बन सकते हैं।
प्रदेश की जनता उन्हें स्नेहपूर्वक ‘बाबोसा’ कहती थी। ‘राजस्थान का एक सिंह—भैरोंसिंह’ का उद्घोष उनके जनाधार और लोकप्रियता का प्रतीक बन गया।
अजातशत्रु होने का अर्थ : विरोधी के प्रति भी संवेदना-भैरोंसिंह शेखावत को अजातशत्रु कहने का आशय यह नहीं कि उनके राजनीतिक जीवन में विरोधी नहीं थे। उनके अनेक प्रखर आलोचक और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी थे। किंतु वे मतभेद को व्यक्तिगत वैमनस्य में बदलने के पक्षधर नहीं थे।
वे प्रायः इस भाव को व्यक्त करते थे कि राजनीति में विरोधी हो सकते हैं, शत्रु नहीं। यह दृष्टिकोण उनके व्यवहार में भी दिखाई देता था।
मेरे पैतृक क्षेत्र निम्बाहेड़ा से जुड़ा एक प्रसंग आज भी स्मरण आता है। वहाँ शेखावत चुनाव लड़ रहे थे। कांग्रेस प्रत्याशी के पति राजकीय सेवा में चिकित्सक थे। भाजपा कार्यकर्ताओं ने शिकायत की कि वे सरकारी सेवा में रहते हुए अपनी पत्नी के पक्ष में चुनाव प्रचार कर रहे हैं।
इस पर शेखावत ने सहज भाव से कहा—
“उनकी पत्नी चुनाव लड़ रही है, क्या वे उसकी मदद भी न करें?”
उनके इस उत्तर ने शिकायत को वहीं समाप्त कर दिया।
यह एक छोटा-सा प्रसंग है, किंतु इसमें एक बड़े राजनीतिक व्यक्तित्व की मानसिक उदारता दिखाई देती है। वे किसी घटना को केवल दलगत चश्मे से देखने के बजाय उसके पीछे के मानवीय संबंध को भी समझते थे।
बेशक, सार्वजनिक सेवा में आचरण संबंधी नियमों का पालन आवश्यक है; किंतु किसी शिकायत पर प्रतिक्रिया देने और राजनीतिक विरोधी को अपमानित करने के बीच भी एक अंतर होता है। शेखावत इस अंतर को समझते थे।
उनके लिए राजनीति प्रतिशोध का माध्यम नहीं थी। वे व्यक्तिगत संबंधों को राजनीतिक लाभ-हानि की गणना से ऊपर रखने की क्षमता रखते थे।
एक अन्य प्रसंग उनकी इसी उदारता का परिचायक है। विदेश में चिकित्सा के लिए गए शेखावत के पीछे उनकी सरकार को अस्थिर करने का प्रयास हुआ। अस्वस्थता की स्थिति में वे जयपुर लौटे। चौखी ढाणी में विधायकों का शिविर लगा और अंततः सरकार बच गई।
कुछ समय बाद इस घटनाक्रम में अग्रणी भूमिका निभाने वाले एक वरिष्ठ विधायक के परिवार में शोक हुआ। शेखावत स्वयं उनके घर संवेदना व्यक्त करने पहुँचे। उनके इस व्यवहार से विधायक भावुक हो उठे और बाद में जयपुर पहुँचकर पूरे घटनाक्रम पर खेद व्यक्त किया।
राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रसंग विरोधी को परास्त करने की कहानी नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर पश्चात्ताप और आत्मबोध के लिए स्थान छोड़ने की कहानी है।
वे जानते थे कि सत्ता की लड़ाई समाप्त हो जाती है, लेकिन संबंधों में बची कटुता लंबे समय तक समाज को प्रभावित करती है।
ललित किशोर चतुर्वेदी के साथ : मर्यादापूर्ण आदर्श अदावत-राजस्थान भाजपा के इतिहास में भैरोंसिंह शेखावत और ललित किशोर चतुर्वेदी के संबंधों को राजनीतिक मतभेद और व्यक्तिगत सम्मान के अनूठे उदाहरण के रूप में याद किया जाता है।
दोनों के बीच संगठनात्मक निर्णयों, कार्यशैली और राजनीतिक रणनीतियों को लेकर अनेक बार असहमति रही। सार्वजनिक मंचों पर उनके मतभेद स्पष्ट दिखाई देते थे, किंतु इन मतभेदों ने व्यक्तिगत मर्यादा की सीमा को पार नहीं किया।
चतुर्वेदी से जुड़ा एक चर्चित कथन इस संबंध की विशेषता को प्रकट करता है। जब राजस्थान भाजपा में गुटबाजी को लेकर प्रश्न उठते थे, तब उनके बारे में यह कथन उद्धृत किया जाता था—
“राजस्थान भाजपा में कोई गुट नहीं है, यदि कोई गुट है तो मैं शेखावत गुट का पहला सदस्य हूँ।”
इस कथन में राजनीतिक व्यंग्य भी था, आत्मीयता भी और अपने विरोधी के प्रति सम्मान भी।
राजनीति में विचारों की असहमति स्वाभाविक है। संगठन के भीतर अलग-अलग दृष्टिकोण होना लोकतांत्रिक जीवंतता का संकेत भी हो सकता है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब असहमति के कारण व्यक्ति की निष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगाए जाने लगें अथवा उसके सम्मान और अधिकारों को चोट पहुँचाई जाए।
शेखावत ने अनेक विषयों पर असहमति के बावजूद चतुर्वेदी के राजनीतिक अधिकारों, चुनावी अवसरों और व्यक्तिगत सम्मान में हस्तक्षेप नहीं किया। दोनों के संबंध इस बात का उदाहरण बने कि संगठन में प्रतिस्पर्धा और संवाद एक साथ चल सकते हैं।
यह संयोगपूर्ण किंतु भावुक करने वाला प्रसंग भी उल्लेखनीय है कि उपराष्ट्रपति पद से शेखावत की विदाई के अवसर पर ललित किशोर चतुर्वेदी राज्यसभा में उपस्थित थे। उस अवसर पर चतुर्वेदी का वक्तव्य उनके संबंधों की आत्मीयता को प्रकट करने वाला माना गया।
इस संबंध को स्मरण करते हुए एक बात विशेष रूप से ध्यान में आती है— राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में जीतना बड़ी बात हो सकती है, लेकिन प्रतिद्वंद्वी के मन में सम्मान बनाए रखना उससे भी बड़ी उपलब्धि है।
आज जब राजनीतिक असहमति अनेक बार व्यक्तिगत कटुता, आरोप-प्रत्यारोप और सार्वजनिक अपमान में बदल जाती है, तब शेखावत और चतुर्वेदी के संबंध लोकतांत्रिक मर्यादा की एक महत्त्वपूर्ण मिसाल प्रस्तुत करते हैं।
उपराष्ट्रपति पद : राजस्थान की माटी का राष्ट्रीय गौरव-19 अगस्त 2002 को भैरोंसिंह शेखावत भारत के उपराष्ट्रपति निर्वाचित हुए। यह उनके व्यक्तिगत जीवन की उपलब्धि के साथ-साथ राजस्थान की माटी और यहाँ की राजनीतिक परंपरा के लिए भी गौरव का क्षण था।
एक छोटे से गाँव में जन्मा व्यक्ति, जिसने अपने जीवन का आरंभ सीमित साधनों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच किया था, देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों में से एक तक पहुँचा। यह यात्रा भारतीय लोकतंत्र की समावेशी शक्ति का प्रतीक है।
उनके निर्वाचन के अवसर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उनके संघर्षपूर्ण जीवन को रेखांकित करते हुए कहा था—
“आप धूल से उठकर माथे का चंदन बन गये हैं।”
यह कथन केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि की प्रशंसा नहीं था। इसमें उस सामान्य जन की प्रतिष्ठा भी निहित थी, जो परिश्रम, निष्ठा और जनविश्वास के बल पर सार्वजनिक जीवन में असाधारण ऊँचाइयाँ प्राप्त कर सकता है।
तत्कालीन विपक्ष के नेता डॉ. मनमोहन सिंह ने भी उनके दीर्घ सार्वजनिक जीवन, अनुभव और ज्ञान की सराहना की थी।
उपराष्ट्रपति के रूप में शेखावत ने राज्यसभा के सभापति का दायित्व निभाया। इस संवैधानिक भूमिका में उनके संसदीय अनुभव और राजनीतिक संतुलन का विशेष महत्त्व था। उन्होंने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर संसदीय संस्थाओं की गरिमा के अनुरूप आचरण करने का प्रयास किया।
यह उनके व्यक्तित्व का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष था—वे जिस भूमिका में रहे, उसके दायित्व और मर्यादा को समझते थे। संगठन के कार्यकर्ता से लेकर मुख्यमंत्री और फिर उपराष्ट्रपति तक, प्रत्येक पद पर उनकी पहचान अनुभव और राजनीतिक विवेक से जुड़ी रही।
बाबोसा की विरासत : पद नहीं, मूल्य स्मरणीय हैं-15 मई 2010 को भैरोंसिंह शेखावत ने अंतिम श्वास ली। उनके निधन के साथ राजस्थान ने एक ऐसे जननेता को खो दिया, जिसकी पहचान केवल राजनीतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसके सहज व्यवहार, संघर्षशीलता और जनसंपर्क से बनी थी।
उनके जीवन का मूल्यांकन करते समय तीन बातें विशेष रूप से सामने आती हैं।
पहली, अंत्योदय के प्रति प्रतिबद्धता। शासन की योजनाओं में निर्धनतम व्यक्ति को स्थान देना और विकास को अंतिम पंक्ति तक पहुँचाने का प्रयास करना।
दूसरी, सिद्धांतों के प्रति दृढ़ता। सामाजिक दबाव, राजनीतिक सुविधा अथवा तात्कालिक लाभ के लिए अपने विवेक और सार्वजनिक दायित्व से समझौता न करना।
तीसरी, राजनीतिक मर्यादा और मानवीय उदारता। विरोधी के प्रति सम्मान बनाए रखना, मतभेद को व्यक्तिगत शत्रुता न बनने देना और सार्वजनिक जीवन में संवाद की संभावना को जीवित रखना।
आज राजनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है—सत्ता और सेवा के बीच संतुलन बनाए रखना। राजनीतिक सफलता को पद, प्रभाव और चुनावी विजय से मापना आसान है; किंतु किसी नेता की वास्तविक ऊँचाई इस बात से तय होती है कि उसने समाज को क्या दिया, लोकतांत्रिक संस्थाओं को कितना मजबूत किया और अपने विरोधियों के साथ कैसा व्यवहार किया।
भैरोंसिंह शेखावत का जीवन इन प्रश्नों पर विचार करने का अवसर देता है।
दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय दर्शन से प्रेरित जनकल्याणकारी दृष्टि, ग्रामीण जीवन के अनुभवों से विकसित प्रशासनिक समझ, संगठन के प्रति निष्ठा और विरोधियों के प्रति उदारता—इन सबने मिलकर उनके व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाया।
उनकी स्मृति में सच्ची श्रद्धांजलि केवल उनके योगदान का गुणगान करना नहीं, बल्कि उन मूल्यों को सार्वजनिक जीवन में अपनाने का संकल्प लेना है, जिनके कारण वे आज भी स्मरण किए जाते हैं।
नेता वह नहीं, जो केवल अपने समर्थकों का विश्वास जीत ले; बड़ा नेता वह है, जो अपने विरोधियों के मन में भी सम्मान अर्जित करे।
राजनीति में पद प्राप्त करना उपलब्धि है, परंतु मर्यादा बनाए रखना व्यक्तित्व की महानता है।
भैरोंसिंह शेखावत का जीवन इसी महानता का स्मरण कराता है।
अंत्योदय को राजधर्म मानने वाले, संघर्ष को साधना और राजनीति को जनसेवा का माध्यम बनाने वाले, राजस्थान की माटी के गौरव ‘बाबोसा’ भैरोंसिंह शेखावत को उनकी जयन्ती पर सादर नमन।
— डॉ. विजय विप्लवी
पूर्व पार्षद, उदयपुर
By Udaipurviews

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