उदयपुर। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ द्वारा सिंधी बाजार स्थित पंचायती नोहरे में चल रहे चातुर्मास के दौरान आयोजित प्रवचन सभा में सुकन मुनि महाराज ने कहा कि बचपन में हिंदी का एक दोहा याद करवाया गया था। आज भी वो दोहा स्मृति में है। जीवन का यथार्थ सत्य उसमें लिखा प्रतीत होता है। कदली सीप भुजंग मुख, स्वाति एक गुण तीन। कदली यानी केले का पेड़, समंदर में होने वाला सीप और सर्प, स्वाति नक्षत्र में शरद पूर्णिमा की रात हो, उस समय होने वाली बारिश उसकी अपने आप में कोई गुणवत्ता नही है लेकिन केली वृक्ष पर गिरी हुई बारिश कपूर बन जाता है, सांप कर मुंह में जहर और सीप में मोती बन जाता है। जैसो संगत कीजिये, वैसो फल होए। संगति जिसकी करोगे वैसे बन जाओगे। बारिश ने तीन अलग अलग संगति की और वैसे अलग अलग रूप प्रकट हुए। 12 अच्छे सेब मिलकर 1 खराब को अच्छी नही बना सकते लेकिन 1 खराब सेब 12 अच्छी सेब को भी खराब कर सकती है। दुर्गुण जल्दी फैलते हैं।
उन्होने कहा कि आत्मा किसकी संगति कर रही है, इस पर विचार करने की जरूरत है। तीन काल में भी आत्मा जड़ नही हो सकती। जो चौतन्य है उसे जड़ और जो जड़ है उसे चौतन्य करने का कोई उपाय नही है। अगर परमात्मा की संगति कर ले तो उसको परमात्मा होने से कोई रोक नही सकता।
जैसी संगति करोगे, वैसी गति होगी
