उदयपुर। माइनिंग इंजीनियर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एमईएआई), राजस्थान चैप्टर, उदयपुर द्वारा “अरावली क्षेत्र में सतत खनन हेतु रणनीतिक मार्गःएक राष्ट्रीय दृष्टिकोण” विषय पर यूसीसीआई, मेवाड़ इंडस्ट्रियल एरिया, उदयपुर में एक तकनीकी व्याख्यान का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में खनन अभियांत्रिकी विभाग के पूर्व प्रोफेसर डॉ. गोविंद सिंह भारद्वाज ने अरावली क्षेत्र में खनन के भूवैज्ञानिक, आर्थिक, पर्यावरणीय एवं नीतिगत पहलुओं पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए बताया कि अरावली पर्वतमाला विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है (लगभग 2 अरब वर्ष पुरानी), जो लगभग 670 किमी तक गुजरात, राजस्थान, हरियाणा एवं दिल्ली में विस्तृत है। यह क्षेत्र खनिज संपदा से समृद्ध है, जिसमें प्रमुख रूप से सीसा-जस्ता, तांबा, संगमरमर, ग्रेनाइट, चूना पत्थर एवं अन्य औद्योगिक खनिज शामिल हैं। अरावली क्षेत्र भारत की खनिज अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है, जैसे, देश के 100 प्रतिशत जस्ता उत्पादन, सीसा, चांदी, जिप्सम एवं संगमरमर में प्रमुख हिस्सेदारी एवं लगभग 16 प्रतिशत राष्ट्रीय खनिज मूल्य में योगदान देता है।
आर्थिक योगदान एवं जमीनी वास्तविकता-राजस्थान में खनन क्षेत्र का वार्षिक उत्पादन लगभग 23,869 करोड़ है तथा यह लगभग 30 लाख लोगों को रोजगार प्रदान करता है। यह राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (ळैक्च्) में लगभग 4.4 प्रतिशत योगदान देता है। डॉ. भारद्वाज ने कहा कि खनन केवल औद्योगिक गतिविधि नहीं, बल्कि ग्रामीण एवं जनजातीय अर्थव्यवस्था का आधार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि, खनन पर पूर्ण प्रतिबंध से रोजगार में कमी, आयात में वृद्धि एवं अवैध खनन बढ़ेगा तथा अनियंत्रित खनन से पर्यावरणीय क्षति बढ़ेगी अतः संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि जटिल भूवैज्ञानिक संरचना (असमरूप अयस्क, ढाल अस्थिरता), पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ एवं कानूनी जटिलताएँ, खनन के प्रति गलत धारणाएँ,कुछ क्षेत्रों में अवैज्ञानिक खनन एवं अपर्याप्त पुनर्वास, जैसी वर्तमान खनन परिदृश्य एवं चुनौतियां प्रमुख है। उन्होंने बताया कि राजस्थान के कुल क्षेत्रफल का केवल 0.54ः भाग ही खनन के अंतर्गत है।
अरावली क्षेत्र पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है, जो, मरुस्थलीकरण को रोकने में सहायक, भूजल पुनर्भरण का प्रमुख स्रोत, जैव विविधता का संरक्षण क्षेत्र है। सुप्रीम कोर्ट (नवंबर 2025) द्वारा अरावली की एक समान परिभाषा स्वीकार की गई तथा सतत खनन हेतु प्रबंधन योजना तैयार करनें के निर्देश दिए गए। डॉ. भारद्वाज ने “भूवैज्ञानिक अरावली” और “कानूनी अरावली” के बीच अंतर को नीति निर्माण में प्रमुख चुनौती बताया। सतत खननः भविष्य की दिशा, कार्यक्रम का मुख्य संदेश अरावली के लिए खनन रोकना नहीं, बल्कि अवैज्ञानिक खनन को रोक कर वैज्ञानिक खनन को बढ़ाना है।
रणनीतिक सुझाव-अंत में एसोसिएशन के सचिव आसिफ अंसारी ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए बताया की अरावली पर्वतमाला से जुड़े विषय केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह क्षेत्र रोजगार सृजन, खनिज संसाधनों के उपयोग एवं क्षेत्रीय विकास से भी जुड़ा हुआ है। अतः आवश्यक है कि इन सभी पहलुओं के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। एमईएआई द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव इस दिशा में एक सकारात्मक प्रयास है, जिससे न्यायालय को वैज्ञानिक एवं वस्तुनिष्ठ जानकारी उपलब्ध हो सकेगी। यह पहल यह सुनिश्चित करने में सहायक होगी कि अरावली क्षेत्र में पर्यावरणीय संरक्षण, सतत विकास एवं जिम्मेदार खनन के सिद्धांतों के अनुरूप निर्णय लिए जाएं।अंततः यह कहा जा सकता है कि अरावली पर्वतमाला के संरक्षण एवं विकास से जुड़े इस महत्वपूर्ण विषय पर सभी हितधारकों का समन्वित प्रयास आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण एव खनिजों का संतुलित दोहन सुनिश्चित किया जा सके।
खनन क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों के प्रतिनिधि संगठन एमईएआई माईनिंग इंजीनियर्स एसोसिएशन आॅफ इंडिया राजस्थान चैप्टर, उदयपुर द्वारा गत 10 मार्च को सर्वोच्च न्यायालय में लंबित वाद “अरावली पर्वतमाला की परिभाषा एवं संबंधित विषय” एसयूओ एमओटीयू रिट पीटीशन सीविल नं. 10/2025 के संदर्भ मे लर्नेडं अमिकस कूरिएई को एक महत्वपूर्ण पत्र प्रेषित किया गया है। इस पत्र के माध्यम से संगठन ने अरावली क्षेत्र के वैज्ञानिक, पर्यावरणीय एवं नियंत्रित खनन से जुड़े पहलुओं पर अपनी तकनीकी विशेषज्ञता उपलब्ध कराने का प्रस्ताव रखा है। पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि संगठन के पास खनन, भू-विज्ञान, पर्यावरण एवं नियामक क्षेत्रों के अनुभवी विशेषज्ञ उपलब्ध हैं, जोन्यायालय द्वारा प्रस्तावित उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति के कार्य में सार्थक योगदान दे सकते हैं। साथ ही, संगठन द्वारा डॉ. हितांशु कौशल का नाम एक विशेषज्ञ सदस्य के रूप में प्रस्तावित किया गया है, जिनके पास खनन तकनीक एवं विधिक मामलों का व्यापक अनुभव है। यह पहल अरावली क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण, संतुलित विकास एवं वैज्ञानिक खनन के बीच सामंजस्य स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
इस अवसर पर होली मिलन एवं ईद मिलन समारोह भी रखा गया। इस कार्यक्रम में ए.के .कोठारी , पी आर आमेटा, हितांशु कौशल, मकबूल अहमद, एम एस पालीवाल, वाई सी गुप्ता जैसे 70 खनन विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, उद्योग प्रतिनिधियों एवं प्रशासनिक अधिकारियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन संयुक्त सचिव डॉ. हितांशु कौशल द्वारा किया गया। कार्यक्रम के आरंभ में डॉ हितांशु कौशल ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए मुख्य वक्ता डाँ गोविन्द सिंह भारद्वाज का सक्षिप्त परीचय प्रस्तुत किया। मुख्य वक्ता का स्वागत अरूण कुमार कोठारी, पूर्व अध्यक्ष एमईएआई एवं आसिफ एम अंसारी, सचिव एमईएआई-उदयपुर द्वारा किया गया।
अरावली पर्वतमाला के संरक्षण, वैज्ञानिक परिभाषा एवं संतुलित खनन के संबंध में महत्वपूर्ण पहल
