वर्षों पुरानी परंपराओं से लबरेज है भाणदा का पंचमी का मेला : इस दौरान होते हैं विविध पारंपरिक आयोजन

प्रतीक जैन
कल 18 मार्च को होगा प्रसिद्ध मेला आयोजन
खेरवाड़ा, होलिका दहन के बाद खेरवाड़ा तथा नयागांव उपखंड के विभिन्न गांवों में 10 दिन तक मेलों की धूम रहती है। एक अनूठी परंपरा एवं सांस्कृतिक विरासत का उदाहरण है भाणदा पंचमी का मेला। जो 19वीं सदी से निरंतर भरता आ रहा है। प्रतिवर्ष इस मेले में करीब 10000 से अधिक मेलार्थी मनोरंजन एवं मेले का लुत्फ उठाने के लिए पहुंचते हैं।
होलिका दहन के दिन से शुरू हो जाती है गैर
होलिका दहन के बाद एकम से चतुर्थी की रात तक गांव के मध्य स्थित चौराहे पर ढोल की थाप पर गैर नृत्य होते हैं। बरसों से चल रही परंपरा के मुताबिक चौराहे पर 12 फलों के ढोल आते हैं और ढोल की थाप एवं शहनाई की मधुर ध्वनि पर स्थानीय लोगों द्वारा गैर खेली जाती है। यही नहीं चौराहे पर ढोल लेकर दौड़ते हुए चढ़ने की भी प्रतियोगिता होती है जिसमें ढोल वादकों एवं विभिन्न फलों के लोगों का उत्साह देखते ही बनता है।
गोटी के सानिध्य में होता है मेले का आयोजन
परंपरा के अनुसार गांव की उपली खिड़की में निवासरत जैन परिवार 19वीं सदी से ही गोटी की परंपरा का निर्वहन करते हुए आ रहा है। वर्तमान में इस परिवार के वंशज चार भाइयों में अनुज अजीत जैन गोटी यानी मेला प्रमुख का दायित्व निभा रहे हैं। गांव में होलिका दहन, चारों दिन गैर नृत्य का आयोजन,मेले का शुभारंभ एवं समापन उनके सानिध्य एवं इशारे पर ही किया जाता है।
चतुर्थी को खेलते हैं रंग पंचमी
पंचमी को क्षेत्र के प्रसिद्ध मेले का आयोजन होने से बरसों से चतुर्थी के दिन रंगों का त्यौहार मनाया जाता है। पूरे गांव एवं फलों के लोग चौराहे पर इकट्ठा होकर एक दूसरे पर रंग डालकर होली की शुभकामनाएं देते हैं। परंपरा के अनुसार शाम को निचली खिड़की में सभी समाजजन रावना के नाम से बैठक करते हैं जो विगत कई वर्षों से कोठारी परिवार के सानिध्य में होती है। वर्तमान में इस परिवार की ओर से रमेश चंद्र कोठारी द्वारा इसका नेतृत्व किया जा रहा है। बैठक में वर्ष पर्यंत हुए कोई आपसी मतभेद या मनमुटाव को समझाइस के साथ निपटाया जाता है। परंपरा के अनुसार मेले के दिन ढोल के बाद मेला स्थल पर पीपल पर चढ़ने की प्रतियोगिता आयोजित होती है जिसमें विजेता को कोठारी परिवार की ओर से पगड़ी पहना कर सम्मानित किया जाता है।
इस वर्ष मेला आयोजन 18 मार्च को
मेला प्रमुख अजीत जैन ने बताया कि इस वर्ष मेले का भव्य आयोजन 18 मार्च मंगलवार को किया जाएगा। उसी दिन दोपहर बाद ढोल दौड़ की अनूठी प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। गोटी के इशारे पर गांव के मध्य स्थित चौराहे से बंदूक की गोली की आवाज के बाद ढोल प्रतियोगिता होती है जिसमें 11 ढोल अलग रास्ते से एवं एक में ढोल जिसको वेरिहाल कहा जाता है दूसरे रास्ते से दौड़ते हैं, वेरिहाल ढोल में दैविक शक्ति का वास माना जाता है। कुछ दूरी के बाद सभी ढोलों का समागम होता है और प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करने की होड़ रहती है। अंत में सभी ढोल तालाब के किनारे स्थित भैरव मंदिर पर पहुंचते हैं। यहां भी ढोलों की थाप पर गैर नृत्य किया जाता है। यह माना जाता है कि वेरिहाल ढोल यदि प्रतियोगिता के दौरान मध्य में रहता है तो अगला वर्ष हर दृष्टि से सुख समृद्धि के साथ गुजरने का अनुमान लगाया जाता है।
मेला आयोजन में उपखण्ड से निचले स्तर के अधिकारी कर्मचारी रहते है मौजूद
मेले की अंगूठी परंपरा को जीवंत बनाए रखने एवं शान्ति तथा सुरक्षा व्यवस्था को अक्षुण्ण बनाए रखने हेतु उपखंड अधिकारी, तहसीलदार, पुलिस उप अधीक्षक, विकास अधिकारी, विभिन्न स्थानों के थाना अधिकारी, सरपंच, ग्राम विकास अधिकारी, पटवारी सहित समस्त अधिकारी एवं कर्मचारी इसमें उपस्थिति प्रदान करते हैं। यही नहीं गांव के संभ्रांत नागरिक जो गुजरात,मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र ,उदयपुर, डूंगरपुर आदि अन्य क्षेत्रों में निवासरत है परंतु मेले की परंपराओं को बनाए रखने इस दिन अपने उपस्थिति परिवार सहित प्रदान करते हैं। मेला स्थल पर आसपास से करीब 200 दुकानदार अपनी दुकानें लगाकर अपना व्यवसाय मेला आयोजन के दौरान करते हैं। मनोरंजन के लिए झूले, चकरी वगैरह भी लगाए जाते हैं।
इस तरह भाणदा गांव में पुरानी अनूठी सांस्कृतिक परंपराओं को निभाते हुए प्रतिवर्ष शांतिपूर्ण तरीके से पंचमी पर क्षैत्र में प्रसिद्ध भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।
By Udaipurviews

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