उदयपुर, 18 सितम्बर। केशवनगर स्थित अरिहंत वाटिका में आत्मोदय वर्षावास में बुधवार को हुक्मगच्छाधिपति आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने फरमाया कि शरीरमुखी मन शत्रु होता है क्योंकि वह शरीर की परवाह करता है, किन्तु आत्ममुखी मन मित्र होता है क्योंकि वह पुद्गलों का राग छोड़कर आत्मा की अनंत शक्तियों को पहचानने में लग जाता है। हम अपने मन को वश में करके जो कुछ भी करना व पाना चाहते हैं वह प्राप्त कर सकते हैं। मन को वश में करने के पांच सूत्र हैं -मन को समझो, मन को समझाओ, मन को फटकार लगाओ, मन को मनाओ, मन को ऊपर चढ़ाओ। इन पांच कार्यों से मन को वश में किया जा सकता है। मन के वशीभूत होकर जो पुद्गलों का भोग करता है, पुद्गल उन्हीं का भोग करते हैं। बेहतर तो यही है कि मन का उपयोग जीव एवं पुद्गल के बीच संबंध को तोड़ने में किया जाए। आपने फरमाया कि होगा तो करूंगा, यह इच्छा है जो कभी पूरी नहीं होती। करूंगा तो होगा, यह संकल्प है। संकल्प कभी अधूरे नहीं रहते। संकल्प करके निर्णय लें, निर्णय को निष्ठा में बदलें एवं क्रियान्वयन करें तो सफलता निश्चित मिलती है। उपाध्याय श्री जितेश मुनि जी म.सा. ने कहा कि अधिकांशजन उपयोग शून्य होकर क्रिया करके पापों का बंध करते हैं। समझदार व्यक्ति बिना वजह आरम्भ-समारंभ नहीं करते। बिना मांगे सलाह नहीं देते, बेवजह नहीं बोलते, बेमतलब कोई कार्य नहीं करते। अभय देकर स्वयं अभय बनें। जियो और जीने दो की संस्कृति अपनाएं। सभी प्राणभूत तत्वों को साता पहुंचाएं। श्रद्धेय श्री यशभद्र जी म.सा. ने कहा कि मान कषाय हमारी गति को बिगाड़ने वाला है। इस कषाय से जीने वाले कट जाउंगा पर झुकूंगा नहीं इस भाव में जीते हैं। इससे हमारा सम्यक्त्व मलिन होता है। मीडिया प्रभारी डॉ. हंसा हिंगड़ ने बताया कि आज फतहनगर संघ, बिजयनगर संघ एवं उदयपुर का अम्बामाता श्रीसंघ का महिला मंडल उपस्थित हुआ। फतहनगर श्रीसंघ ने आगामी समय में होने वाली दीक्षा, एक जनवरी की मांगलिक का कार्यक्रम फतहनगर को प्रदान करने की विनती की।
अपने मन को वश में करके सब कुछ पाया जा सकता है : आचार्य विजयराज
