– नवकार भवन व शान्ति भवन में हो रहा अखंड नवकार मंत्र का जाप
– त्याग-तपस्याओं का लगा ठाठ
उदयपुर, 2 सितम्बर। केशवगर नगर स्थित अरिहंत वाटिका में आत्मोदय वर्षावास में हुक्मगच्छाधिपति आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने सोमवार को धर्मसभा में कहा कि पर्युषण पर्व एकमात्र आत्म विशुद्धि के लिए मनाया जाता है। यह लोकोत्तर पर्व है। आत्मा पर अनादिकाल से कर्मों का भार है, हमारे हाथ एवं कंधों पर भार आ जाए तो हमें महसूस होता है, मगर आत्मा पर रहे हुए कर्मों का भार हमें महसूस नहीं होता। कर्म भार से दबी आत्मा को हल्का करना ही इस पर्व का उद्धेश्य है। संसार में जितने भी मत पंथ है, मार्ग है, उनमें मोक्ष मार्ग ग्रेट है और पर्व तो बहुत है मगर सब पर्वों में पर्युषण पर्व श्रेष्ठ है। व्यक्ति में विद्यमान दोष कभी स्वाभाविक नहीं होते व गुण कभी वैभाविक नहीं होते। गुण सभी में विद्यमान होते हैं पर उन पर आवरण आ जाता है। ज्ञानावरणीय एवं दर्शनावरणीय कर्म के कारण गुणों पर आवरण आ जाता है, मोहनीय कर्म के कारण विस्मरण एवं अन्तराय कर्म के कारण गुणों का अपहरण हो जाता है। मगर व्यक्ति की पात्रता है तो साधना एवं आराधना सफल हो जाती है। उन्होंने सुखी एवं सम्पन्न होने के गुर बताते हुए कहा कि जो व्यसन मुक्त, संवेदनशील, निष्काम, सेवाभावी, संतों के प्रति आस्थावान एवं सुपात्रदान में रूचि रखते हैं वे सुखी एवं सम्पन्न होते हैं। उपाध्याय श्री जितेश मुनि जी म.सा. ने कहा कि प्रभु महावीर कहते हैं कि जैसा पुरूषार्थ करोगे, वैसा ही प्रारब्ध निर्मित होता है। व्यर्थ के कर्म बंधन से बचना हो तो जिस काम को किए बिना काम चलता हो, वह कर्म मत करो। जो करना पड़ रहा है उसमें अहंकार भाव मत लाओ। श्रद्धेय रत्नेश मुनि जी म.सा. ने अंतगढ़ सूत्र का वांचन करते हुए देवकी माता के 6 अणगार पुत्रों का विवेचन किया। श्रद्धेय श्री विनोद मुनि जी म.सा. ने पर्युषण चालीसा का समवेत गान कराया। महासती श्री मयंकमणि जी म.सा. ने भी धर्मसभा को सम्बोधित किया। श्रीसंघ अध्यक्ष इंदर सिंह मेहता ने बताया कि पर्युषण पर्व के प्रथम दिन से शान्ति भवन एवं नवकार भवन में लगातार चौबीस घंटे नवकार मंत्र का जाप किया जा रहा है जिसमें श्रावक-श्राविकाएं पूरी तन्मयता के साथ जाप कर रहे हैं। वहीं त्याग-तपस्याओं की झड़ी लग गई है। श्रीसंघ मंत्री पुष्पेंद्र बड़ाला ने बताया कि सोमवार दोपहर में महिला संघ द्वारा आयोजित धार्मिक शेयर मार्केट की प्रतियोगिता महासती मयंकमणि जी म.सा. के निर्देशन में सम्पन्न हुई।
सुखी एवं सम्पन्न बनना है तो व्यसन मुक्त, संवेदनशील, सेवाभावी एवं संतो के प्रति आस्थावान बनें : आचार्य विजयराज
