फतहनगर। यहां के लक्ष्मीनारायण मंदिर में विश्वशांति,जनकल्याणार्थ एवं सकल मनोकामनार्थ चल रहे श्रीमद् भागवत कथा महायज्ञ का शनिवार को प्रभु श्रीकृष्ण के साकेत प्रस्थान प्रसंग के साथ ही समापन किया गया।
कथा कार्यक्रम 8 अक्म्टूबर से माणकचंद मेनारिया के मुखारविंद से चल रहा था। नित्य सायं चल रही कथा के सामपन पर आज सुबह कथा का आयोजन किया गया जहां आज प्रातः 10 से दोपहर 1 बजे तक की सातवें दिवस की कथा में सत्राजित प्रसंग, सामंतक मणि चोरी कथा, कृष्ण जामवंत यद्ध, जामवंति से विवाह, सूर्यपुत्री कालिन्द्री से विवाह, भौमासुर वध कर 16100 विवाह, शिशुपाल वध, द्रोपदी चीरहरण, सुदामा चरित्र एवं श्री कृष्ण के साकेत प्रस्थान, दत्तात्रेय प्रसंग की भावपूर्ण प्रस्तुति दी गयी।
समापन के दिन आगे कथा प्रवक्ता मेनारिया ने कहा कि प्रभु के साकेत जाने पर भी श्रीमद् भागवत रूप में सदैव विद्यमान है। साधक योगी को चाहिए कि आत्मा निर्मल योगमय रहे। भंवर की तरह सार संग्रहित करें, मधुमक्खी की तरह धन एकत्रित न करे। बालक की तरह भूलना चाहिए, शरीर गंदगी का भंडार है इससे मोह नहीं करें। मरण को सुधारने के लिए हरि स्मरण करें। भागवत मरना सिखाती है और रामायण जीना सिखाती है।
जैसे जहर जानकर या अनजान में खाने पर भी मृत्यु निश्चित है वैसे ही भाव अथवा कुभाव से किया कीर्तन सदैव कल्याणकारी ही है। जिस घर में रामायण, गीता, भागवतजी रहती है वह तीर्थ स्थल ही है। सात दिवसीय कथा आयोजन का संचालन कन्हैयालाल अग्रवाल द्वारा किया गया। सभी के सम्मान के साथ महाआरती के बाद प्रसाद वितरण किया गया एवं सभी ने महाप्रसादी में भोजन प्रसाद ग्रहण किया।
