महानवमी पर होती है, स्वामीभक्त एवं शक्ति का प्रतीक अश्व की पूजा घोड़ा अनुसरण करता है पितृकुल का

उदयपुर व्यूज़ | ताजा खबरें

उदयपुर , 18 अक्टूबर। पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविध्यालय नवानिया के जनस्वास्थ्य विभाग के सहायक आचार्य डा.सुरेन्द्र छंगाणी ने बताया कि पौराणिक काल से महानवमी के दिन शक्ति एवं शस्त्रों  की पूजा की जाती है। यह विशेष रूप से मेवाड़ उदयपुर और राजपूत राजाओं की सूर्यवंशी परंपरा का एक  जीवंत हिस्सा है। जहाँ घोड़ो विशेषकर मारवाड़ी नस्ल के घोड़ों की पूजा की जाती है।डा.छंगाणी के अनुसार  यह पूजन  अश्व शक्ति का प्रतीक ही नही अपितु स्वामीभक्त, स्वाभिमान, आत्मविश्वास समर्पण भाव एवं वफादारी का भी प्रतीक है।  हालांकि आज के तीव्र गतिमान वैज्ञानिक युग में युद्ध पद्धति में परिवर्तन हो जाने के फलस्वरूप भी घोड़ों की अपनी अन्य विशेषताओं के कारण उसका महत्व कम नहीं हुआ है।कृषि कार्य सवारी एवं बोझा उठाने के कामों में भी इसका बहुत उपयोग है। बहुत से गरीब लोगों की जीविका का साधन ही घोड़ा है ।
डा.छंगाणी  ने बताया कि निश्चित रूप से हम अश्व  पूजन कर इनके इन्हीं सभी गुणो को प्रतिष्ठित करतें है। पशुधन विकास में  अश्वओं का का महत्वपूर्ण योगदान है। ऐसी मान्यता है किआकृति प्रकृति में पुरूष मातृकुल का अनुसरण करता है लेकिन घोड़ा पितृकुल का। जैसा कि इन कहावतों में स्पष्ट हो रहा है।
नर नानेरै, घोड़ा दादेरै।
मा पर पूत पिता पर घोड़ों, घणो नहीं तो थोड़म थोड़ो।
पुरानी कथाएं और मान्यता इस बात को रेखांकित करती है कि घोड़े की नस्ल, चाल और स्वभाव में उसके पिता के  कुल का प्रभाव सबसे अधिक  होता है
भारत में पशु गणना 2019 के अनुसार अनुमानित 3 लाख 42 हजार घोड़ें व पौनीज हैं। भारत का 10 प्रतिशत अर्थात् लगभग 33679 घोड़े व  पौनीज राजस्थान में है। देश में अश्वओं की संख्या में राजस्थान का तीसरा स्थान है। उदयपुर जिले में  अनुमानित 1013 घोड़े व पौनीज हैं। राजस्थान के मारवाड़ी नस्ल के घोड़ो ने अन्तर्राश्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर रखी है। राजस्थान के कहावतों, दोहों में भी घोड़ों का जिक्र बहुत ही किया गया है। एक कहावत में कहा गया है कि जिसने तेज चलने वाले घोड़े की सवारी का आनंद नहीं उठाया, उसका जन्म व्यर्थ ही गयारू
”तीखा तुरी न माणिया, भड़ सिर खग्ग न भग्ग।
जलम अकारथ ही गयो, गौरी गले न लग्ग ।। ”
इसी प्रकार एक अन्य दोहे में घोड़े की पीठ को “ स्वर्ग की निशानी ” बतलाया गया है।
” चौथी पीठ तुरंग री, सुरग निशानी च्यार। ”
डा.छंगाणी  ने आमजन से आग्रह किया कि हम सबका यह सम्मिलित प्रयास होना चाहिये कि हम अश्व के संरक्षण, संवर्द्धन एवं विकास में अपनी अहम भूमिका निभायें।

By Udaipurviews

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