उदयपुर। स्थानीय देवेन्द्र धाम में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए जैन संत डॉ. सुरेन्द्र मुनि ने ज्ञान को दो भागों में विभक्त किया। उन्होंने कहा कि पहला सांसारिक ज्ञान है, जो भौतिक वस्तुओं, विधि-विधान व खान-पान का अभ्यास कराता है। आजकल लोग इसे ही सब कुछ मान लेते हैं, जबकि जीवन की वास्तविक सार्थकता सांसारिक ज्ञान के साथ आत्मा विषयक आध्यात्मिक ज्ञान से ही संभव है। हमारे पूर्वज इसी आत्मिक ज्ञान में लीन रहकर दया, क्षमा, सत्य और शील को अपनाते थे। आचार्यों के अनुसार केवल बाहरी क्रिया से नहीं, बल्कि क्रिया के साथ ज्ञान होने पर ही मोक्ष संभव है।
सभा में भक्तामर स्वाध्याय के बाद शरीर के सात चक्रों की सात मुद्राओं में सात बीज मंत्रों की साधना करवाई गई जिसमें सभी गुरु भक्तों ने अपने भीतर असीम ऊर्जा का उर्ध्वीकरण महसूस किया। प्रवर्तक राजेन्द्र मुनि ने कहा कि अज्ञानता के कारण व्यक्ति अपना मूल स्वभाव भूल जाता है। उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि भेड़ियों के बीच रहकर शेर का बच्चा खुद को भेड़ समझने लगता है, लेकिन असली स्वरूप का ज्ञान होते ही शेर की तरह दहाड़ता है। वैसे ही मनुष्य मन-इंद्रियों के प्रभाव में खुद को संसारी मान बैठता है; आत्मज्ञान होने पर ही आत्मा का बोध होता है। प्रवर्तक डॉ. राजेंद्र मुनि के द्वारा सभी को 18 तारीख से प्रारंभ हो रही आयंबिल ओली तप आराधना करने की प्रेरणा प्रदान की गई। कार्यक्रम में दिल्ली, पंजाब व सूरत से पधारे अतिथियों का स्वागत किया गया।
सांसारिक ज्ञान के साथ आत्मिक ज्ञान भी जरूरीःजैन संत डॉ. सुरेन्द्र मुनि
