उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में बुधवार को आयोजित नियमित धर्मसभा में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने श्रावक-श्राविकाओं को प्रेम, मोह, करुणा और वैराग्य का गूढ़ आध्यात्मिक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि प्रेम और मोह में अंतर समझना आवश्यक है। जहां कोई बंधन नहीं होता और भावना असीमित होती है, वह प्रेम है, जबकि जहां बाध्यता और सीमाओं का बंधन होता है, वहां मोह और राग होता है।
साध्वीश्री ने कहा कि भगवान महावीर ने केवलज्ञान प्राप्त करने के तुरंत बाद संघ की स्थापना की। उनके हृदय में समस्त जीवों के कल्याण की भावना थी। सामान्य मनुष्य कोई भी कार्य करने से पहले यह सोचता है कि उसे उससे क्या मिलेगा और उसका स्वार्थ कैसे पूरा होगा। आज किसी को मुस्कुराहट देने में भी व्यक्ति यह सोचने लगता है कि सामने वाला इसके योग्य है या नहीं। इसके विपरीत, भगवान महावीर की करुणा निस्वार्थ थी। उनकी भावना प्रत्येक जीव के कल्याण की थी।
उन्होंने कहा कि साधु अपने चारों ओर की दीवारें तोड़कर सभी को अपना मानता है, जबकि गृहस्थ प्रायः अपने परिवार तक सीमित रह जाता है। गृहस्थ का परिवार सीमित होता है, लेकिन साधु का परिवार पूरा समाज होता है। साधु के बीमार होने पर पूरा गांव उसकी चिंता करता है। इसलिए व्यक्ति को विचार करना चाहिए कि उसे अपने जीवन में सीमित संबंधों का दायरा रखना है या प्रेम और अपनत्व के माध्यम से पूरे समाज को अपना परिवार बनाना है।
वैराग्य हृदय में हो, तभी जीवन में आएगा वास्तविक परिवर्तन
साध्वीश्री ने कहा कि श्मशान में जाने पर प्रत्येक व्यक्ति के मन में वैराग्य उत्पन्न होता है, लेकिन वहां से लौटने के बाद भी जिसके मन में वैराग्य बना रहे, वही सच्चा वैरागी है। वैराग्य केवल कुछ समय के लिए उत्पन्न होने वाला भाव नहीं, बल्कि हृदय में स्थायी रूप से विकसित होने वाली भावना है।
उन्होंने जीवन को सुंदर और सार्थक बनाने के लिए माला, ताला और शालाकृइन तीन चीजों के महत्व पर प्रकाश डाला। साथ ही कहा कि सम्यक समझ से सम्यक बोध की प्राप्ति होती है। धर्मसभा में आत्मचिंतन का संदेश देते हुए उन्होंने श्रावक-श्राविकाओं से कहा कि यह विचार करना आवश्यक है कि धर्मसभा से बाहर निकलने के बाद भी प्रवचन की बातें मन में रहती हैं या सब कुछ वहीं तक सीमित रह जाता है। धर्मसभा में साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने मधुर गीत प्रस्तुत किया।
ट्रस्ट अध्यक्ष राज लोढ़ा ने बताया कि इस अवसर इचलकरंजी से आये श्रावक जसराज का बहुमान किया गया।
म में बंधन नहीं, मोह में होती है बाध्यता, सभी जीवों के कल्याण की भावना ही सच्ची करुणाःसाध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी
