उदयपुर, 15 सितम्बर। नारायण सेवा संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल के सानिध्य में चल रही ‘अपनों से अपनी बात’ कथा में गणेश जी से जुड़े प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से नियमित भक्ति, विनम्रता, क्षमा, सेवा और जरूरतमंदों के प्रति संवेदना का संदेश दिया गया।
भक्त मोरया की कथा सुनाते हुए प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि मोरया ने वर्षों तक कठिन परिस्थितियों में मोरगांव जाकर गणेश जी की आराधना की। वृद्धावस्था में जब उनके लिए मंदिर जाना संभव नहीं रहा तो उन्हें स्वप्न में संदेश मिला कि अब उन्हें आने की आवश्यकता नहीं, भगवान स्वयं उनके पास आएंगे। इसके बाद उन्हें नदी में गणेश जी की मूर्ति प्राप्त हुई। उन्होंने कहा कि भक्ति की परीक्षा पूजा करने में नहीं, बल्कि उसे नियमितता और अनुशासन के साथ निभाने में है। मोरया की इसी निष्ठा के कारण आज भक्त और भगवान का नाम एक साथ लिया जाता है।
गणेश जी के मूषक वाहन का प्रसंग बताते हुए उन्होंने कहा कि क्रौंच नामक गंधर्व अहंकारवश एक ऋषि का अपमान कर बैठा और शाप से मूषक बन गया। उसमें शक्ति तो थी, लेकिन सही दिशा नहीं थी। गणेश जी ने उसकी शक्ति को नष्ट करने के बजाय उसे अपने वाहन के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि किसी की क्षमता को दबाने के बजाय उसे सही दिशा देना जरूरी है। बड़े व्यक्ति की पहचान इस बात से होती है कि वह कमजोर के अनुसार स्वयं को ढालकर उसे साथ लेकर आगे बढ़े।
रिद्धि-सिद्धि के प्रसंग से उन्होंने कहा कि समाज अक्सर व्यक्ति का मूल्य उसके बाहरी रूप से आंकता है, जबकि वास्तविक पहचान उसके कर्म, क्षमता और योग्यता से बनती है। उन्होंने कहा कि दिव्यांगजनों को भी समान सम्मान, अवसर और सहयोग मिलना चाहिए।
परशुराम और गणेश जी के प्रसंग में उन्होंने बताया कि फरसे के वार से गणेश जी का एक दांत टूट गया, लेकिन उन्होंने परशुराम को क्षमा कर दिया। भगवान शिव के आशीर्वाद से उनका यही टूटापन उनकी पहचान बन गया और वे ‘एकदंत’ कहलाए।
उन्होंने कहा कि परिस्थितियां कैसी भी हों, मनुष्य को नियमितता, विनम्रता, क्षमा और करुणा नहीं छोड़नी चाहिए। दिव्यांगजनों को कृत्रिम अंग, सहायक साधन, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर देकर उन्हें सक्षम बनाना ही सच्ची सेवा है। किसी व्यक्ति को कमजोर या अधूरा समझना उचित नहीं। आवश्यकता उसकी क्षमता को पहचान कर उसे आगे बढ़ने का अवसर देने की है। कथा के दौरान उन्होंने दिव्यांगजनों के साथ संवाद किया। सैकड़ों श्रद्धालुओं ने कथा का रसास्वादन किया।
