उदयपुर। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, उदयपुर के तत्वावधान में देवेंद्र धाम स्थित महावीर समवशरण में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए डॉ. सुरेन्द्र मुनि ने कहा कि जीवन जीना भी एक कला है। केवल धन-संपत्ति जुटाना, परिवार का पालन-पोषण करना, इच्छानुसार प्रतिष्ठा प्राप्त करना अथवा मौज-शौक में जीवन व्यतीत करना ही जीवन की सार्थकता नहीं है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन के वास्तविक स्वरूप को पहचानना चाहिए। जिस नाम से लोग हमें पुकारते हैं, वह केवल शरीर की पहचान है, जबकि हमारा वास्तविक स्वरूप चेतन आत्मा है। आत्मा ज्ञान और गुणों से परिपूर्ण तथा निर्विकार है। इसलिए मनुष्य को बाहरी सुख-सुविधाओं के बजाय अपने भीतर झांककर आत्मचिंतन करना चाहिए।प्रवर्तक डॉ. राजेन्द्र मुनि ने कहा कि संसार में रहते हुए व्यक्ति अनेक मोह-माया और भौतिक आकर्षणों में उलझ जाता है। इनसे ऊपर उठकर संयम, साधना और सद्विचारों को जीवन में अपनाना आवश्यक है। आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने से जीवन में शांति, संतोष और आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति होती है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे शरीर और आत्मा के अंतर को समझें तथा जीवन को केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित न रखते हुए आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाएं। युवा परिषद के अध्यक्ष निर्मल गोखरू ने बताया कि 28 अगस्त को विशाल धर्म सभा में रक्षाबंधन का त्यौहार यंत्र-मंत्र अनुष्ठान के साथ मनाया जाएगा।
जीवन की सार्थकता भौतिक सुखों में नहीं, आत्मचिंतन और संयम मेःडॉ. सुरेन्द्र मुनि
