वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में नवपद आराधना के पांचवें दिन साधु पद पर व्याख्यान
उदयपुर। स्थानीय वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में चल रहे नियमित व्याख्यान के दौरान गुरुवार को साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी (आदि ठाणा 6) ने नवपद की आराधना के पांचवें दिन साधु पद का भावपूर्ण विवेचन किया। उन्होंने उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए कहा कि अरिहंत और सिद्ध बनने से पूर्व आत्मा को साधु बनना ही पड़ता है। नवपद को साध्य, साधक और साधनकृइन तीन भागों में समझा जा सकता है। मोक्ष हमारी मंजिल (साध्य) है, साधु-आचार्य-उपाध्याय यात्री (साधक) हैं तथा ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप इसके साधन (सवारी) हैं।
साध्वी श्रीजी ने स्पष्ट किया कि महापुरुषों ने सहन करने वाले को साधु कहा है, लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि सहनशीलता और कष्ट झेलने की जिम्मेदारी केवल साधु की ही है। श्रावक का दायित्व है कि वह साधु-भगवंतों को हरसंभव अनुकूलता प्रदान करे। यदि श्रावक साधु पद की आराधना में सहायक बनते हैं, तो उनके कर्मों की निर्जरा होती है।
वर्तमान जीवनशैली पर प्रकाश डालते हुए साध्वी श्री ने कहा कि आज बचपन में जवान होना तो आसान है, लेकिन जवानी में बचपन जैसी निष्कपटता बनाए रखना बेहद कठिन है। आज मनुष्य खुलकर हंसना और रोना दोनों भूल चुका है। मन के भीतर का दुख यदि खुलकर रोकर बाहर निकाल दिया जाए, तो भीतर से आत्मा हल्की और शुद्ध हो जाती है। उन्होंने कहा कि गुरु-शिष्य के संबंध में सांसारिक प्रेम नहीं बल्कि विशुद्ध भक्ति और निष्काम त्याग की भावना होनी चाहिए।
कार्यक्रम के दौरान साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भक्तिमय गीत की प्रस्तुति दी। आज प्रतिष्ठा मुहूर्त के लिए विनंती करने उज्जैन से अवंतिका पार्श्वनाथ मंदिर ट्रस्टी गण पधारे उनका बहुमान उदयपुर दादावाड़ी ट्रस्ट मंडल द्वारा स्वागत सत्कार अभिनंदन किया गया।
सहन करना केवल साधु का धर्म नहीं, श्रावक भी अनुकूलता देकर करें कर्मों की निर्जराःसाध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी
