संसार की चाह नहीं, आत्मशुद्धि की राह बने जीवन का लक्ष्यःसाध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी

उदयपुर व्यूज़ | ताजा खबरें

धर्म की क्रिया से अधिक महत्वपूर्ण है उसके पीछे की भावना और उद्देश्य
उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने मंगलवार को कहा कि धर्म साधना तभी सार्थक होती है, जब उसके पीछे आत्मशुद्धि की भावना और स्पष्ट उद्देश्य हो। परमात्मा ने केवल्य ज्ञान प्राप्त करने के बाद अपने पुरुषार्थ से अनादिकाल से आत्मा पर जमे कर्मरूपी मैल को दूर किया। हमें भी आत्मा को निर्मल बनाने के लिए अपनी रुचि और जीवन के लक्ष्य को बदलना होगा।
साध्वीश्री ने कहा कि सफेद कपड़े को एक माह पहनने के बाद साफ करने में काफी मेहनत करनी पड़ती है। हमारी आत्मा तो अनादिकाल से शरीर के साथ जुड़ी हुई है और चारों गतियों में भ्रमण करते हुए उस पर अनगिनत कर्मों का मैल जमा हुआ है। ऐसे में केवल धार्मिक क्रियाएं और अनुष्ठान करना पर्याप्त नहीं, बल्कि हमारी भीतरी रुचि और भावना भी उसी दिशा में होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि रुचि का अर्थ भीतर की इच्छा और आशय है। यदि तप, जप, दर्शन एवं धार्मिक अनुष्ठानों का उद्देश्य आत्मा को पवित्र करना है तो उसका फल आत्मकल्याण की दिशा में जाएगा। लेकिन यदि हमारी रुचि संसार, शरीर और उससे जुड़ी सुविधाओं को बढ़ाने में है तो धार्मिक क्रियाओं का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं हो पाएगा।
साध्वीश्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि दूध में थोड़ा सा जहर मिल जाए तो उसमें मेवा डालने के बाद भी उसे कोई नहीं पीएगा। उसी प्रकार परमात्मा की आज्ञा के अनुसार अनुष्ठान करने के बावजूद यदि उसके पीछे संसार को बढ़ाने की इच्छा है तो वह साधना अपने उद्देश्य में सफल नहीं होगी।
साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी ने कहा कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य आत्मकल्याण होना चाहिए। इसके लिए संसार की क्षणभंगुर सुविधाओं से रुचि हटाकर आत्मा की शुद्धि, संयम और साधना की ओर बढ़ना आवश्यक है। इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत किया।

By Udaipurviews

Related Posts

error: Content is protected !!