– साध्वियों के सानिध्य में अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की
– आयड़ जैन तीर्थ में चातुर्मासिक प्रवचनों की श्रृृंखला जारी
उदयपुर 29 अगस्त। श्री जैन श्वेताम्बर महासभा के तत्वावधान में तपागच्छ की उद्गम स्थली आयड़ तीर्थ पर बरखेड़ा तीर्थ द्वारिका शासन दीपिका महत्ता गुरू माता सुमंगलाश्री की शिष्या साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री एवं वैराग्य पूर्णाश्री आदि साध्वियों के सानिध्य में मंगलवार को विविध आयोजन हुए । महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर ने बताया कि आयड़ तीर्थ के आत्म वल्लभ सभागार में सुबह 7 बजे दोनों साध्वियों के सानिध्य में आरती, मंगल दीपक, सुबह सर्व औषधी से महाअभिषेक एवं अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की गई। चातुर्मास संयोजक अशोक जैन ने बताया कि साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री व वैराग्यपूर्णा ने आयड़ तीर्थ में प्रतिदिन प्रवचन माला में आज श्रावक जीवन के कर्तव्य में 19 वे कर्तव्य जिनपूजा के विवेचन में बताया । उन्होंन कहां कि सर्वथा दोष रहित जिनेश्वर भगवंत की जो त्रिसंध्या पूजा करता है, वह जीव तीसरे भव में अथवा आठवें भव में अवश्य मोक्ष प्राप्त करता है। अरिहंत परमात्मा के उपकारों का वर्णन शब्दातीत है। ऐसे तारक परमात्मा की भक्ति करना श्रावक जीवन का परम आवश्यक कर्तव्य है। जिनेश्वर परमात्मा के विरह में जिनेश्वर परमात्मा की प्रतिमा की पूजा भक्ति-स्तवना करके साक्षात् तीर्थकर परमात्मा की भक्ति से जन्य पुण्य का अर्जन कर सकते हैं। चार प्रकार के निक्षेप होते हैं- अरिहंत परमात्मा का नाम जैसे महावीर स्वामी नाम निक्षेप कहलाता है। अरिहंत परमात्मा की मूर्ति को स्थापना निक्षेप कहते हैं। अरिहंत परमात्मा की भूत- कालीन और भविष्य कालीन अवस्थाओं को द्रव्य निक्षेप कहते हैं। समवसरण में धर्म देशना देते हुए तारक तीर्थकर परमात्मा की अवस्था को साथ निक्षेप कहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन पर शुभ-अशुभ निमित्तों का असर अवश्य होता है। शुभनिमित्त को पाकर मन शुभ शान को पाता है और अशुभ निमित्त को पाकर अशुभ मान को प्राप्त करता है। चंचल पित को लशीभूत करने के लिए, इन्द्रियों को शांत करने के लिए और विषयों से विरक्ति पाने के लिए देवाधिदेव परमात्मा की प्रतिमा एक सर्वश्रेष्ठ आलंबन है। इसलिए परमात्मा की सेवा पूजा सिचना करना अत्यन्त आवश्यक है। महासभा अध्यक्ष तेजसिंह बोल्या ने बताया कि आयड़ जैन तीर्थ पर प्रतिदिन सुबह 9.15 बजे से चातुर्मासिक प्रवचनों की श्रृंखला में धर्म ज्ञान गंगा अनवरत बह रही है।
परमात्मा की भक्ति करना श्रावक जीवन का परम कर्तव्य : साध्वी प्रफुल्लप्रभा
