उदयपुर, 10 अगस्त। केशवनगर स्थित अरिहंत वाटिका में आत्मोदय चातुर्मास में शनिवार को आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि यह लोक षड्द्रव्यों, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय, जीवास्तिकाय एवं काल के सहारे गतिमान है, जैसे ट्रेन पटरी के बिना गति नहीं कर सकती वैसे ही अस्तिकाय के बिना गति करना संभव नहीं है। कालूदायी, शैलोदायी आदि दार्शनिकों के संशय पर महावीर प्रभु ने कहा कि सर्वज्ञ अस्ति को अस्ति एवं नास्ति को नास्ति कहते हैं। हम आत्म साधना करें, स्वार्थ भाव से कोई काम न करें। निष्काम भाव से किया गया कार्य साधना बनता है। साधना करके साधक एवं साधक बनकर ही आराधक बना जा सकता है। उपाध्याय श्री जितेश मुनि जी म.सा. ने फरमाया कि हम स्वस्थ रहें, इसके लिए भोजन बनाते समय द्रव्य, क्षेत्र, काल व भाव की शुद्धता रखनी चाहिए। द्रव्य से पदार्थ शुद्ध होना चाहिए। क्षेत्र से हर कहीं नहीं बैठकर, दूसरों में आहार संज्ञा न जगे, यह ध्यान रखकर भोजन करना चाहिए। काल की दृष्टि से सूर्योदय के बाद व सूर्यास्त से पूर्व भोजन ग्रहण करना चाहिए। शुभ एवं शुद्ध भावों के साथ, सब जीवों से मंगल मैत्री करके भोजन ग्रहण करना चाहिए। श्रीसंघ अध्यक्ष इंदर सिंह मेहता ने बताया कि शिविर में दूसरे दिन श्रद्धेय श्री विनोद मुनि जी म.सा. ने भेद विज्ञान पर, विदित मुनि जी म.सा. ने आगम के अनुसार श्राविका चौथा पाया पर एवं आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने चतुर्थ सत्र में पच्चीस क्रिया पर प्रकाश डालते हुए श्राविका शक्ति को पूर्व जन्मकृत पाप क्रिया का एवं इस जन्म में मृत्यु के समय लगने वाली पाप क्रिया का समाूहिक त्याग-प्रत्याख्यान करवाया।
निष्काम भाव से किया गया कार्य साधना बनता है : आचार्य विजयराज
