वासुपूज्य मन्दिर में साध्वी श्रीजी के गुरूपूर्णिमा पर हुए व्याख्यान
उदयपुर। श्री जैन श्वेताम्बर वासुपूज्य महाराज मंदिर में रविवार को साध्वी डॉ. संयम ज्योति श्रीजी ने गुरु पूर्णिमा पर कहा कि गुरु और शिष्य का रिश्ता संसार में माता-पिता के बाद सबसे अनमोल है। कई बातें जब शिष्य किसी से नहीं कह पाता वो गुरु से कह सकता है और गुरु बिना कहे भी समझ जाता है। इसके अप्रतिम उदाहरण गुरु द्रोणाचार्य और एकलव्य का है। इसी तरह कर्ण और परशुराम का है।
उन्होंने कहा कि जिस तरह एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य के एक बार कहने पर ही अपना सीधे हाथ का अंगूठा काटकर दे दिया जबकि एकलव्य जानता था कि अंगूठा देने के बाद वह कभी तीर नही चला पायेगा। गुरु आज्ञा सर्वाेपरि मानते हुए उसने ना-नुकर किये बिना एक बार में अंगूठा काटकर दे दिया। इसी तरह परशुराम से कर्ण ने छिपाकर ज्ञान अर्जित किया। इस पर परशुराम ने कर्ण को श्राप दिया कि जो कुछ मैंने सिखाया है तुम उसका आनंद ले सकते हो, पर जब तुम्हें इसकी सचमुच जरूरत होगी, तब तुम सभी मंत्र भूल जाओगे जिनकी तुम्हें जरूरत होगी, और वही तुम्हारा अंत होगा। कर्ण को इसका अंजाम अपना जीवन देकर भुगतना पड़ा।
साध्वी संयम साक्षी श्रीजी ने गुरु-शिष्य परंपरा पर सुंदर गीत प्रस्तुति दी वहीं खतरगच्छ महिला परिषद की सदस्याओं ने भी गुरु शिष्य के संबंधों पर सुंदर गीत प्रस्तुत किया।
जो बात शिष्य किसी से नहीं कह सकता है वह गुरू को आसानी से कह सकता,ऐसा है गुरू शिष्य का रिश्ताःसाध्वी संयम ज्योति
