संकल्प से बड़ा कोई मंगल नहीं और संकल्प से बड़ा कोई उत्सव नहीं है : आचार्य विजयराज

उदयपुर, 20 अगस्त। केशवनगर स्थित अरिहंत वाटिका में आत्मोदय वर्षावास में हुक्मगच्छाधिपति आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने मंगलवार को धर्मसभा में कहा कि जीव का लक्षण उपयोग है। जीव उपयोग गुण के कारण ही सुख-दुःख का अनुभव करता है। जीव जब अपने समान ही दूसरे के सुख-दुःख का अनुभव करने लगता है तो यह उसका अनुकम्पा अर्थात् दया का भाव है। यह भाव जीव को संवेदनशील बना देता है। यदि व्यक्ति की मनःस्थिति सही होती है तो सभी परिस्थितियाँ अनुकूल बन जाती हैं। संकल्प शक्ति सही मनःस्थिति से ही जगती है। संकल्प से बड़ी कोई साधना नहीं, संकल्प से बड़ा कोई मंगल नहीं और संकल्प से बड़ा कोई उत्सव नहीं है। यदि जीवन को उत्सवमय बनाना चाहते हैं तो रिश्तों को संभालें। रिश्ते फरिश्ते होते हैं। भार को हल्का करे उसका नाम है भाई, भावुकता में न बहने दे उसका नाम है बहिन, जो सुख प्रदान करे उसका नाम है संतान, जो धर्म से जोड़े रखे उसका नाम है धर्मपत्नी, जो कल्याण में सहायक बने उसका नाम है कुटुम्ब, जो सही समझ दे उसका नाम है समाज, जो सत्य में साथ दे उसका नाम है साथी, जो नई जान-पहचान दे उसका नाम है परिचित, जो पतन से बचाए उसका नाम है पड़ौसी, जो जीवन का महत्व समझाये उसका नाम है माँ, जो जीवन को पावन बनाये, उसका नाम है पिता, जो गौरव दिलावे, उसका नाम है गुरू, जो परमात्मा बनाये, उसका नाम है प्रभु। उपाध्याय श्री जितेश मुनि जी म.सा. ने फरमाया कि अच्छा श्रावक पर परिवाद का पाप नहीं करता अर्थात् पर निंदा से बचता है। यदि जीवन को वंदनीय एवं अभिनंदनीय बनाना चाहते हैं तो छिद्रान्वेषण की वृत्ति को छोड़ें एवं गुणान्वेषी बनें। जो पर निंदा करते हैं, वे मक्खी व मच्छर की तरह सब जगह से उड़ाये जाते हैं।

By Udaipurviews

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