उदयपुर, 25 जुलाई। श्री जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक श्रीसंघ के तत्वावधान में मालदास स्ट्रीट स्थित आराधना भवन में चातुर्मास कर रहे पंन्यास प्रवर निरागरत्न जी म.सा. ने गुरूवार को धर्मसभा में कहा कि भगवान महावीर की प्रगति यात्रा के चार बोध थे, पहला लक्ष्य बोध-हम चिंतन करें कि सालों से आराधना करते आ रहे है अपनी प्रगति क्यों नहीं हुई? रावण को नृत्य-पूजा से तीर्थंकर नाम कर्म की प्राप्ति, इरियावहिया से अइमुत्ता को केवल ज्ञान, अपने को क्यों नहीं कारण लक्ष्य बोध नहीं। प्रवचन श्रवण में परिवर्तन का, सामायिक से समाधि का, पूजा से प्रसन्नता का लक्ष्य है। दूसरा-शान्ति बोध-हम शान्ति पाने के लिए कमाने में दस घंटे लगे फिर भी शान्ति नहीं मिली क्यों, क्योंकि शान्ति छोड़ने में है, तीसरा-प्रेम बोध-सहनशक्ति को क्रिएट करने की भावना पुण्य की शक्ति से मिलती है यह बात बराबर है पर सहनशक्ति तो प्रेम से ही मिलती है, और चौथा-कर्तव्य बोध-सबसे पहले मोक्ष औचित्य पालन करने वालों का, प्रभु की सेवा में पुण्य बंध होता है पर बीमार को छोड़ कर प्रभु सेवा तो कर्म बंध होता है। तीर्थंकर जैसे तीर्थंकर भी मर्यादा का पालन करते हैं तो चिंतन करने हमें पहले क्या करना चाहिए? चातुर्मास प्रवक्ता राजेश जवेरिया ने बताया कि पंन्यास प्रवर के प्रवचन को श्रवण करने प्रतिदिन सैंकड़ों श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित हो रहे हैं। बाहर से पधारने वाले श्रावकों का क्रम निरन्तर बना हुआ है।
प्रवचन श्रवण में परिवर्तन का, सामायिक से समाधि का, पूजा से प्रसन्नता का लक्ष्य: निरागरत्न
