उपाध्याय पुष्कर मुनि म.सा.का संयम शताब्दी शिखर समारोह एवं पुष्पवती जी म.सा का जन्म शताब्दी समारोह आज,देशभर के श्रावक-श्राविकायें लेगी भाग

उदयपुर। जैनाचार्य श्री देवेन्द्र मुनि शिक्षण एवं चिकित्सा शोध संस्थान ट्रस्ट उदयपुर के तत्वावधान में देशभर के सभी गुरू परिवारों द्वारा आगामी 11 फरवरी को भुवाणा रोड़ स्थित देवेन्द्र धाम में 6 दिवसीय उपाध्याय पुष्कर मुनि म.सा.का संयम शताब्दी शिखर समारोह एवं पुष्पवती जी म.सा का जन्म शताब्दी समारोह आयोजित किये जायेंगे।
ट्रस्ट की कार्यकारी अध्यक्ष पूर्व महापौर रजनी डंागी ने बताया कि समारोह में  महाश्रमण जिनेन्द्र मुनि जी म. ‘‘काव्य तीर्थ’,तपस्वी रत्न प्रवीण मुनि म.सा. श्रमण संघीय सलाहकार पूज्य श्री दिनेश मुनि जी म सा.,डाॅ. द्वीपेन्द्र मुनि म.सा. डाॅ. श्री पुष्पेन्द्र मुनि म.सा., महासती किरण प्रभाजी म.सा.,सेवारत्ना स्थवीरा महासती प्रियदर्शना मसा.ओजस्वी वक्ता महासती श्रीरत्न ज्योति म.सा.,महासती डाॅ. अर्पिता श्रीजी,महासती मोक्षदाश्री,महासती डाॅ. विचक्षणश्री, महासती श्री वंदिताश्री,महासती डाॅ. श्री हर्ष प्रभा,विदुषी महासती सुमन प्रभा म.सा. की गौरवपूर्ण उपस्थिति रहेगी।
श्री तारक जैन गुरू ग्रन्थालय के मंत्री रमेश खोखावत ने बताया कि कार्यक्रमों की श्रृंखला के प्रथम दिवस 7 फरवरी को अन्न सेवा दिवस के रूप में अन्नदान, दूसरे दिन 8 फरवरी को जप दिवस श्री तारक जैन गुरू ग्रन्थालय में, तीसरे दिन 9 फरवरी को गुरू पुष्कर भव्य वंदनावली एवं लोगस्स थैरेप,चैथे दिन 10 फरवरी को एक शाम गुरू गुरूणी के नाम  भक्ति संध्या देवेन्द्र धाम में आयोजित की गई। पंाचवें दिन 11 फरवरी को शिखर शताब्दी समारोह देवेन्द्र धाम में प्रातः साढ़े नौ बजे से आयोजित किया जायेगा। छठें और अंतिम दिन 18 फरवरी को रक्तदान कार्यक्रम श्रीतारक जैन गुरू ग्रन्थालय में आयोजित किया जायेगा। उन्होंने बताया कि समारोह में विभिन्न गुरूओं द्वारा लिखित 10 पुस्तकों का विमोचन किया जायेगा।
गुरू पुकर मुनि का जन्म नाम अंबालाल था और उनका जन्म सेमटाल (गुरु पुष्कर नगर) उदयपुर में 17 अक्टूबर 1910 को वाली बाई सूरजमल पालीवाल के यहंा हुआ था। 12 जून 1924 को जालौर में महास्थविर पूज्य ताराचन्द म.सा.त्र से दीक्षा ग्रहण की। उनके दादा गुरू ज्येष्ठमल म.सा. एवं गुरूणी महासाध्वी धूलकुंवर म.सा. थी।
उन्होंने अपने जीवन में वैदिक, जैन आगम साहित्य, दर्शन, न्याय, मीमांसा, वेद आदि धर्माे का अध्ययन किया। संस्कृत, प्राकृत, हिन्दी, गुजराती, मराठी, अंग्रेजी, उर्दू भाषाओं का ज्ञानार्जन किया। 30 अगस्त 1976 को गुरू पुष्कर मुनि रायचूर (कर्नाटक) में उपाध्साय पद से सुशोभित किया गया। गुरूदेव ने अपने जीवन में कथा, कहानी, उपन्यास, प्रवचन, निबन्ध सहित अनेक विषयों पर 135 पुस्तकों का लेखन किया। अपने जीवन मे ंउन्होंने 69 चातुर्मास किये एवं 75 साधु-साध्वियों को दीक्षित किया।
गुरू पुष्कर मुनि को अध्यात्म योगी, साधना के शिखर पुरुष, राजस्थान केसरी जैसी पदवियों से सुशोभित किया गया। तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा 1984 में विश्व संत की उपाधि से सम्मानित किया गया।
उन्होंने अपने जीवनकाल में राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, गोवा, दिल्ली, हरियाणा, उत्तरप्रदेश इत्यादि 80 हजार किलोमीटर पदयात्रा कर जैन धर्म का प्रचार-प्रसार किया। उनके सबसे प्रमुख शिष्य आचार्य सम्राट् देवेन्द्र मुनि म.सा. थे। उनकी प्रेरणा से ही प्रमुख संस्था श्री तारक गुरु जैन ग्रन्थालय का 1966 में निर्माण किया गया।
नवकार महामंत्र के अनन्य साधक, विश्व में नवकार महामंत्र के महान् आराधक के नाम से विश्रुत मुख्य उपलब्धि रही। 3 अप्रैल 1993 को श्री पुष्कर गुरु पावन धाम में समाधि ली।
महाश्रमणी श्री पुष्पवती जी म.सा. का जन्म 18 नवम्बर, 1924 को उदयपुर में श्रीमती प्रेमकुंवर की कुक्षी से हुआ। इनकेे पिता जीवनसिंह वर्डिया थे। इनका बाल्यकाल का नाम सुन्दरी था। पुष्पवती म.सा. आचार्य सम्राट देवेन्द्र मुनि म.सा. की बड़ी बहिन थी। इनको दीक्षा पूर्व कई कठोर परीक्षाओं के दौर से गुजरना पड़ा। अंततोगत्वा न्यायालय द्वारा दीक्षा की अनुमति प्राप्त हुई थी।
विश्व संत, साधना के शिखर पुरुष उपाध्याय पूज्य गुरूदेव श्री पुष्कर मुनि जी म.सा. की सन्निधि में 12 फरवरी 1938 में सद्गुरूणी सोहनकुंवर म. सा. से आर्हती दीक्षा ग्रहण की।
उन्होंने आगम, न्याय, दर्शन शास्त्र, व्याकरण का गहन अध्ययन करते हुये हिन्दी, संस्कृत, प्राकृत, न्याय तीर्थ, जैन सिद्धांताचार्य आदि की उच्चतम् परीक्षाएं उत्तीर्ण की। वे लेखन कला में सिद्धहस्त होते हुये विविध विषयों में रचनाओं जैसे सती का श्राप, कंचन और कसौटी, किनारे-किनारे, पुष्प और पराग, खोलो मन के द्वार, फूल और भंवरा आदि अनेक कृतियां का लेखन कर उनका प्रकाशन कराया। इसके साथ-साथ विविध ग्रन्थों का सम्पादन का श्रेय भी प्राप्त किया।
आपने जीवन का अंतिम समय श्री तारक गुरू जैन ग्रन्थालय उदयपुर में व्यतीत करते हुये 12 अप्रैल 2007 को संथारे के साथ महाप्रयाण किया। इनका स्वभाव अत्यंत विनम्र, मधुर, सहज और प्रभावशाली रहा।

By Udaipurviews

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