उदयपुर। “संसार में मिलने वाली सुख-सुविधाएं अस्थायी हैं, आत्मा का वास्तविक घर मोक्ष है। इसलिए मनुष्य को सांसारिक आकर्षणों में उलझने के बजाय अपने जीवन के परम लक्ष्य को पहचानना चाहिए।” यह विचार सोमवार को वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में आयोजित नियमित धर्मसभा में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने व्यक्त किए। उन्होंने सिद्धपद की महत्ता समझाते हुए श्रावक-श्राविकाओं को आत्मा के वास्तविक स्वरूप और मोक्ष प्राप्ति के उद्देश्य से अवगत कराया।
साध्वी श्रीजी ने कहा कि जिस प्रकार विवाह के बाद कन्या का घर ससुराल होता है, उसी प्रकार आत्मा की वास्तविक मंजिल मोक्ष है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हमारा जन्म निगोद से हुआ है और हमारी अंतिम मंजिल मोक्ष है। निगोद को आत्मा का पीहर और मोक्ष को उसका वास्तविक घर मानकर जीवन के उद्देश्य को समझा जा सकता है।
व्यापार में होने वाले लाभ का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आज एक लाख रुपये का लाभ हुआ, लेकिन क्या यह सुख हमेशा बना रहेगा? संसार का सुख परिवर्तनशील है, जबकि परमात्मा से प्राप्त सुख शाश्वत है। सिद्ध आत्मा का सुख प्योर, पर्सनल, परफेक्ट और परमानेंट होता है।
धर्मसभा में साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत किया। धर्मसभा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने प्रवचन का लाभ लिया।
संसार में नहीं, मोक्ष में है आत्मा का स्थायी सुखःसाध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी
