उदयपुर। सूरजपोल स्थित दादावाड़ी में आयोजित धर्मसभा में बोलते हुए साध्वी विरल प्रभा श्रीजी ने कहा कि संसार एक झूला है। कभी ऊपर कभी नीचे। इसी तरह भाव के कारण आत्मा कभी उच्च कुल तो कभी नीच कुल में पैदा हुए। कुत्ते को भूख लगी तो इस घर से उस घर तलाश में दौड़ेगा क्योंकि बोल नही सकता।
मनुष्य भव में जिन धर्म मिला, यह उच्च कुल का भाव है। फिर नीच कौन? धर्म के विपरीत आचरण करने वाला नीच कुल का है। उच्च कुल में हो लेकिन उसका अभिमान नही करना ही उच्च कुल का प्रतीक है अन्यथा अगले भव में नीच कुल देखना पड़ेगा। अपने कर्मों की वजह से कोई नीच कुल में होता है। वो सोचे लेकिन हम अपने मन में कभी उसके लिए नीच कुल का भाव नही लाएं। मन में कभी हीन भाव नहीं लाना चाहिए। उच्च कुल का होने से अर्जुन द्रोणाचार्य से धनुष विद्या मिली वहीं एकलव्य को नही मिली। उसने सीखी। मन में कभी हीन भावना नही रखी।
साध्वी श्रीजी ने कहा कि अगर मन में भेदभाव रखोगे तो अच्छा व्यक्ति भी कभी बुरा बन जायेगा। जाति से कोई फर्क नही पड़ता।
साध्वी विपुल प्रभा श्रीजी ने कहा कि अगर पेट भरा हुआ हो और सामने कोई पांच पकवान भी रख दे तो नही खाएंगे। दुनिया का ऐसा कोई काम नही जो हम नही कर सकते। सामायिक हो, प्रतिक्रमण हो कौन नही कर सकता। सिर्फ सोच का फर्क है। हमने अपने दिमाग को यह संकेत दे दिया कि ये हमसे नही होगा। अगले जन्म में क्या बनेंगे, किसने सोचा, कभी तक़ीम नहीं है। कर्म राजा यही कहते हैं कि धर्म करने का टाइम नाही है तो कर्म के अनुसार जन्म मिलेगा। साध्वी कृतार्थ प्रभा श्री जी ने गीत प्रस्तुत किया।
धर्म के विपरीत आचरण करने वाला नीच कुल का होताःविरलप्रभाश्री
