समर्पण मांगता है थिएटर — सोनू रोंझिया
उदयपुर, 27 मार्च: विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर रंगकर्म से जुड़े कलाकारों ने थिएटर के महत्व, उसकी चुनौतियों और संभावनाओं पर अपनी राय साझा की। थिएटर केवल एक कला नहीं, बल्कि समाज का दर्पण है, जो हमारे जीवन की सच्चाइयों को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है। इस मौके पर जाने-माने रंगकर्मी सोनू रोंझिया, हरपाल यादव, संतोष भदौरिया और प्रवीन सीलन ने थिएटर के प्रति अपने समर्पण और इसके भविष्य पर अपने विचार रखे।
थिएटर आत्मा की अभिव्यक्ति है – सोनू रोंझिया
रंगमंच एवं फिल्म अभिनेता सोनू रोंझिया का मानना है कि थिएटर केवल मंच पर अभिनय करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कलाकार के जीवन का हिस्सा बन जाता है। उन्होंने कहा कि थिएटर आत्मा की अभिव्यक्ति है, जिसमें हर कलाकार को अपने भीतर की गहराइयों तक जाना होता है। उन्होंने यह भी बताया कि डिजिटल युग में थिएटर की चुनौतियाँ बढ़ गई हैं, लेकिन लाइव परफॉर्मेंस की ऊर्जा और वास्तविकता दर्शकों को आज भी आकर्षित करती है।
थिएटर संघर्ष और समर्पण मांगता है – हरपाल यादव
वरिष्ठ नाट्य निर्देशक हरपाल यादव का कहना है कि थिएटर सिर्फ अभिनय नहीं, बल्कि एक अनुशासन है, जो संघर्ष और समर्पण की मांग करता है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में थिएटर के लिए संसाधन और मंच सीमित होते जा रहे हैं, लेकिन सच्चे रंगकर्मी हमेशा अपने जुनून से थिएटर को जीवंत बनाए रखते हैं। हरपाल कहते हैं कि थिएटर को अधिक प्रोत्साहन देने के लिए सरकारी और निजी स्तर पर सहयोग की आवश्यकता है।
थिएटर समाज का दर्पण है – संतोष भदौरिया
रंगकर्मी संतोष भदौरिया का मानना है कि थिएटर समाज का दर्पण होता है, जो लोगों को सोचने और आत्मविश्लेषण करने के लिए प्रेरित करता है। जब भी कोई कलाकार मंच पर अपने किरदार को जीवंत करता है, तो वह सिर्फ मनोरंजन नहीं करता, बल्कि समाज में एक महत्वपूर्ण संदेश भी देता है। उन्होंने नए कलाकारों को थिएटर से जुड़ने और इसके माध्यम से सामाजिक परिवर्तन लाने की अपील की।
नई पीढ़ी को थिएटर से जोड़ना ज़रूरी – प्रवीन सीलन
बरसों से थिएटर कर रहे रंगकर्मी प्रवीन सीलन का कहना है कि आज के युवा डिजिटल मीडिया की ओर अधिक झुक रहे हैं, जिससे थिएटर के प्रति उनका रुझान कम हो रहा है। सीलन कहते हैं कि नई पीढ़ी को थिएटर से जोड़ने के लिए स्कूलों और कॉलेजों में नाट्य कार्यशालाओं का आयोजन जरूरी है, ताकि वे इस कला के महत्व को समझ सकें।
रंगकर्मियों का मानना है कि बदलते समय में थिएटर को नई तकनीकों और विषयों के साथ आगे बढ़ाने की जरूरत है। डिजिटल प्लेटफार्म के बढ़ते प्रभाव के बावजूद, थिएटर की आत्मा और जीवंतता इसे हमेशा प्रासंगिक बनाए रखेगी।
ओमपाल सीलन,
पत्रकार एवं रंगकर्मी, उदयपुर।
